चतुराम्नाय – चतुष्पीठ – परम्परा

श्रीशिवावतार भगवत्पाद आदिशङ्कराचार्यका जन्म केरलके कालटी गाँवमें हुआ। उनके पिताका नाम श्रीशिवगुरु तथा माताका नाम सती आर्याम्बा था। वे नम्बूदरीपाद ब्राह्मण थे। उनका जन्म युधिष्ठिरशकसंवत् २६३१ तदनुसार, ५०७ बी.सी. वैशाखशुक्लपञ्चमी रविवारके दिन हुआ। पाँचवें वर्षमें उनका उपनयन संस्कार हुआ। आचार्य शङ्करने अपनी माताकी अनुमतिसे आठवें वर्षमें गृहत्याग कर कार्तिक-शुक्ल-देवोत्थान एकादशीके दिन नर्मदा तटपर श्रीगोविन्दपादाचार्यसे संन्यासकी दीक्षा ली। बारह वर्षकी आयुमें उन्होंने ईशादि-उपनिषदोंके सहित ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीतादिपर अद्भुत भाष्योंकी संरचना प्रारम्भ की। तदनन्तर उन्होंने विविध प्रकरणग्रन्थों तथा स्तोत्रोंकी संरचना की।
श्रीशिवातार भगवत्पाद शङ्कराचार्यने राजा सुधन्वाको प्रेरितकर धर्मनियन्त्रित पक्षपातविहीन शोषणविनिर्मुक्त सर्वहितप्रद शासनतन्त्रकी स्थापनाका मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने वैदिक संन्यासको दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातलपर प्रशस्त करनेकी भावनासे चतुराम्नाय-चतुष्पीठसे सम्बद्ध संन्यासियोंको वन, अरण्य; तीर्थ, आश्रम; गिरि, पर्वत, सागर एवं सरस्वती, भारती, पुरी – दशरूपोंमें विभक्त किया।

उन्होंने बृहद् अरण्यरूप वन और लघु वनरूप अरण्यको एवम् वनवासियों तथा अरण्यवासियोंको सुरक्षित रखने और सुसंस्कृत करनेकी भावनासे ऋग्वेदीय श्रीगोवर्द्धनमठसे सम्बद्ध ‘वन‘ तथा ‘अरण्य‘नामा संन्यासियोंको उद्भासित किया। ‘श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि‘ महाभारत-वनपर्वमें सन्निहित इस पुष्पिका-वचनके अनुसार ‘वन‘ और ‘अरण्य‘का अवान्तर प्रभेद सिद्ध है। उन्होंने तीर्थों तथा आश्रमोंको एवं तीर्थ तथा आश्रमनिवासियोंको सुरक्षित रखने और सुसंस्कृत करनेकी भावनासे सामवेदीय श्रीद्वारकामठसे सम्बद्ध ‘तीर्थ‘ तथा ‘आश्रम‘नामा संन्यासियोंको उद्भासित किया।

उन्होंने बृहद् गिरिरूप पर्वतों एवम् लघु पर्वतरूप गिरियोंको एवम् पर्वत तथा गिरिनिवासियोंको सुरक्षित रखने और सुसंस्कृत करनेकी भावनासे अथर्ववेदीय श्रीज्योतिर्मठसे सम्बद्ध ‘पर्वत‘ तथा ‘गिरि‘नामा संन्यासियोंको तद्वत् सागर और सागरके तटवर्ती मनुष्यादिको सुरक्षित रखने और सुसंस्कृत करनेकी भावनासे ‘सागर‘नामा संन्यासियोंको उद्घासित किया। ‘गिरयः पर्वताश्चैव सन्ति तत्र समासतः‘ (महाभारत-आश्वमेधिकपर्व २७.२०) के अनुशीलनसे ‘गिरि‘ और ‘पर्वत‘का अवान्तर भेद सिद्ध है।
उन्होंने बृहत् शिक्षणसंस्थानोंको सुरक्षित तथा सुव्यवस्थित रखनेकी भावनासे यजुर्वेदीय शारदा-शङ्गेरीमठसे सम्बद्ध ‘सरस्वती‘नामा संन्यासिओंको, तद्वत् मध्यम एवम् अवर शिक्षणसंस्थानोंको सुरक्षित तथा सुव्यवस्थित रखनेकी भावनासे ‘भारती‘नामा संन्यासियोंको, तद्वत् अयोध्या, मथुरा, काशी आदि पुरियोंको सुरक्षित एवम् सुसंस्कृत रखनेकी भावनासे ‘पुरी‘नामा संन्यासियोंको उद्भासित किया।

भगवत्पाद आदि शङ्कराचार्य महाभागने सुसंस्कृत, सुशिक्षित, सुरक्षित, सम्पन्न, सेवापरायण और स्वच्छ व्यक्ति तथा समाजकी संरचनाके अभिप्रायसे व्यासपीठ और शासनतन्त्र (राजपीठ) का शोधनकर दोनोंमें सैद्धान्तिक सामञ्जस्य साधा। उन्होंने सत्यसहिष्णुताकी क्रमिक अभिव्यक्तिकी भावनासे वेदान्तप्रस्थानको सर्वोपरि प्रस्थान उद्घोषित किया। उन्होंने एकेश्वरवाद, एकात्मवाद एवम् सर्वात्मवादको वेदान्तोंका परमतात्पर्य सिद्धकर सर्वप्रस्थान- सामञ्जस्यका सर्वहितप्रद स्वरूप ख्यापित किया।
श्रीशिवावतार भगवत्पाद शङ्कराचार्यने युधिष्ठिरसंवत् २६६३, तदनुसार ४७५ बी.सी. कार्तिक पूर्णिमाको बत्तीस वर्षकी आयुमें स्वधाम गमन किया।

पूर्वाम्नाय – गोवर्धनमठ – गुरुपरम्परा

श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीपीठकी स्थापना गतकलि २६१५ कार्तिकशुक्लपञ्चमी, तदनुसार पूर्व विक्रमसंवत् ४२८ – ४२९ तदनुसार बी.सी. ४८६ में हुई। मूर्तिभञ्जकोंके शासनकालमें उच्छिन्न श्रीजगन्नाथादिको गतकलि २६१७ वैशाखशुक्ल दशमीके दिन भगवत्पाद श्रीशङ्कराचार्यने अपने चिन्मय करकमलोंसे पुनः प्रतिष्ठित किया। उन्होंने गोवर्द्धनमठमें श्रीगोवर्द्धननाथको प्रतिष्ठित करनेके अनन्तर अपने प्रथम शिष्य श्रीसनन्दन संज्ञक पद्मपादमहाभागको श्रीगोवर्द्धनमठ – भोगवर्द्धनक्षेत्र – पुरुषोत्तमधाम – पुरीपीठपर अभिषिक्त किया।

माधवस्य सुतः श्रीमान् सनन्दन इति श्रुतः ।
श्रीमत्परमहंसादिविरुदैरखिलैः सह ।।१।।
श्रीपद्मपादः प्रथमाचार्यत्वेनाभिषिच्यतः ।
भोगवारः सम्प्रदायो वनारण्ये पदे स्मृते ।।२।।
द्विजोत्तम माधवके पुत्र श्रीमान् ‘सनन्दन‘ – इस नामसे सुने गये हैं। उन्हींका अन्वर्थनाम श्रीपद्मपाद है।जिनको श्रीशिवावतार भगवत्पाद शङ्कराचार्यने गोवर्द्धनमठके प्रथम जगद्गुरु शङ्कराचार्यपदपर अभिषिक्त किया और तदनुरूप श्रीमत्परमहंसादि समस्त विरुदावलिसे समलङ्कृत किया। इसका सम्प्रदाय भोगवार है। उससे सम्बद्ध शुभप्रद संन्यासियोंके पद अर्थात् योगपट्ट ‘वन‘ तथा ‘अरण्य‘ हैं ।। १, २।।

पुरुषोत्तमं तु क्षेत्रं स्याज्जगन्नाथोऽस्य देवता ।
विमलाख्या हि देवी स्यान्महासत्तेति योच्यते ।। ३ ।।
इसका क्षेत्र ‘पुरुषोत्तम’ नामक है। इसके ‘जगन्नाथ’ देवता हैं। ‘विमला’ नामकी इसकी देवी हैं; जो कि महासत्ता कही जाती हैं ।। ३ ।।

तीर्थं महोदधिः प्रोक्तं ब्रह्मचारी प्रकाशकः ।
महावाक्यं च तत्र स्यात् प्रज्ञानं ब्रह्म चोच्यते ।।४।।
महोदधि इसका ‘तीर्थ’ कहा गया है। इसके ब्रह्मचारी ‘प्रकाश’ हैं। ऋग्वेदसे सम्बद्ध ऐतरेयोपनिषत् ५/३ में सन्निहित ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ इस मठका महावाक्य कहा जाता है ।। ४ ।।
ऋग्वेदपठनं चैव काश्यपो गोत्रमुच्यते ।
अङ्गबङ्गकलिङ्गाश्च मगधोत्पलबर्बराः ।
गोवर्द्धनठाधीना देशाः प्राचीव्यवस्थिताः ।।५।।
‘ऋक्’ इसका वेद है। ‘काश्यप’ इसका ‘गोत्र’ कहा जाता है। अङ्ग (भागलपुर), बङ्ग (बङ्गाल), कलिङ्ग (दक्षिणपूर्व भारत), मगध, उत्कल (ओडिशा), बर्बर (जाङ्गलप्रदेश) नामक पूर्वदिशासे सम्बद्धक्षेत्र इस मठकी अधिकारसीमामें सन्निहित हैं ।। ५ ।।

तस्मिन् गोवर्द्धनमठे शङ्कराचार्यपीठगान् ।
जगदुरून् क्रमाद्वक्ष्ये जन्ममृत्युनिवृत्तये ।।६।।
उस गोवर्द्धनमठमें शङ्कराचार्यपीठपर कालक्रमसे प्रतिष्ठित जगद्गुरुओंके नामका कथन जन्म – मृत्युकी निवृत्तिके लिए क्रमशः करता हूँ ।। ६ ।।
पद्मपादः१ शूलपाणि२स्ततो नारायणा३भिधः ।
विद्यारण्यो४ वामदेवः५ पद्मनाभा६भिधस्ततः ।। ७ ।।
जगन्नाथः७ सप्तमः स्यादष्टमो मधुरेश्वरः८ ।
गोविन्दः९ श्रीधरस्स्वामी१० माधवानन्द११ एव च ।।८।।
कृष्णो ब्रह्मानन्द१२नामा रामानन्दा१३भिधस्ततः ।
वागीश्वरः१४ श्रीपरमेश्वरो१५ गोपाल१६नामकः ।।९।।
जनार्दन१७स्तथा ज्ञानानन्द१८श्चाष्टादशः स्मृतः ।
एकोनविंश आचार्यो बृहदारण्य१९नामकः ।
मध्यकाले स्थितानेतान्नाचार्याख्यान्नमाम्यहम् ।। १० ।।
अथ तीर्थाभिधान् श्रीमद्गोवर्द्धनमठे स्थितान् ।
निरञ्जनार्यपर्यन्तान् गुरून् नाम्ना स्मराम्यहम् ।
महादेवो२०ऽथ परमो ब्रह्मानन्द२१स्ततः स्मृतः ।।११।।
रामानन्द२२स्ततो ज्ञेयस्त्रयोविंशः सदाशिवः२३ ।
हरीश्वरानन्दतीर्थो२४ बोधानन्द२५स्ततः परम् ।।१२।।
श्रीरामकृष्णतीर्थो२६ऽथ चिद्बोधात्मा२७भिधस्ततः ।
तत्त्वाक्षर२८मुनिः पश्चादूनत्रिंशत्तु शङ्करः२९ ।।१३।।
श्रीवासुदेव३०तीर्थश्च हयग्रीवः३१ श्रुतीश्वरः३२ ।
विद्यानन्द३३स्त्रयस्त्रिंशो मुकुन्दानन्द३४ एव च ।।१४।।
हिरण्यगर्भ३५स्तीर्थश्च नित्यानन्द३६स्ततः परम् ।
सप्तत्रिंशत् शिवानन्दो३७ श्रीयोगीश्वरः३८ सुदर्शनः३९ ।। १५।।
अथ श्री व्योमकेशा४०ख्यो ज्ञेयो दामोदर४१स्ततः ।
योगानन्दा४२भिधस्तीर्थो गोलकेश४३स्ततः परम् ।। १६ ।।
श्रीकृष्णानन्द४४तीर्थश्च देवानन्दो४५ऽभिधस्तथा।
चन्द्रचूडा४६भिधः षट्चत्वारिंशोऽथ हलायुधः४७ ।।१७ ।।
सिद्धसेव्य४८स्तारकात्मा४९ ततो बोधायना५०भिधः ।
श्रीधरो५१ नारायण५२श्च ज्ञेयश्चान्यः सदाशिवः५३ ।।१८ ।।
जयकृष्णो५४ विरूपाक्षो५५ विद्यारण्य५६स्तथा परः ।
विश्वेश्वरा५७भिधस्तीर्थो विबुधेश्वर५८ एव च ।। १९।।
महेश्वर५९स्तूनषष्टितमोऽथ मधुसूदनः६० ।
रघूत्तमो६१ रामचन्द्रो६२ योगीन्द्र६३श्च महेश्वरः६४ ।।२० ।।
ओङ्कारा६५ख्यः पञ्चषष्टितमो नारायणो६६ऽपरः ।
जगन्नाथः६७ श्रीधर६८श्च रामचन्द्र६९स्तथाऽपरः ।। २१ ।।
अथ ताम्राक्ष७०तीर्थस्स्यात्तत उग्रेश्वर७१स्स्मृतः ।
उद्दण्ड७२तीर्थस्ततः सङ्कर्षण७३जनार्दनौ७४ ।। २२ ।।
अखण्डा७५त्माभिधस्तीर्थः पञ्चसप्ततिसङ्ख्यकः ।
दामोदरः७६ शिवानन्द७७स्ततः श्रीमद्गदाधरः७८ ।।२३ ।।
विद्याधरो७९ वामन८०श्च ततः श्रीशङ्करो८१ऽपरः ।
नीलकण्ठो८२ रामकृष्ण८३स्तथा श्रीमद्रघूत्तमः८४ ।। २४।।
दामोदरो८५ऽन्यो गोपाल:८६ षड्शीतितमो गुरुः ।
मृत्युञ्जयो८७ऽथ गोविन्दो८८ वासुदेव८९स्तथापरः ।।२५ ।।
गङ्गाधरा९०भिधस्तीर्थस्ततः श्रीमत् सदाशिवः९१ ।
वामदेव९२श्चोपमन्युः९३ हयग्रीवो९४ हरि९५स्तथा ।। २६ ।।
रघूत्तमा९६भिधस्त्वन्यः पुण्डरीकाक्ष९७ एव च।
परश्शङ्कर९८तीर्थश्च शतादूनः प्रकथ्यते ।।२७।।
वेदगर्भा९९भिधस्तीर्थस्ततो वेदान्तभास्करः१०० ।
विज्ञानात्मा१०१ शिवानन्द१०२तीर्थः महेश्वर१०३स्ततः ।।२८ ।।
रामकृष्णा१०४भिधस्त्वन्यत् चतुश्शततमो मतः ।
वृषभध्वजः१०५ शुद्धबोध१०६स्ततः सोमेश्वरा१०७भिधः ।।२९ ।।
अष्टोत्तरशततमो वोपदेवः१०८ प्रकीर्त्तितः ।
शम्भु१०९तीर्थो भृगु११०श्चाथ केशवानन्द१११तीर्थकः ।।३० ।।
विद्यानन्दा११२भिधस्तीर्थो वेदानन्दा११३भिधस्ततः ।
श्रीयोगानन्द११४तीर्थश्च सुतपानन्द११५ एव च ।। ३१।।
ततः श्रीधर११६स्तीर्थोऽन्यस्तथा चान्यो जनार्दनः११७ ।
कामनाशानन्द११८तीर्थः शतमष्टादशाधिकम् ।। ३२ ।।
ततो हरिहरानन्दो११९ गोपाला१२०ख्योऽपरः स्ततः ।
कृष्णानन्दा१२१भिधस्त्वन्यो माधवानन्द१२२ एव च ।। ३३।।
मधुसूदन१२३तीर्थोऽन्यो गोविन्दो१२४ऽथ रघूत्तमः१२५ ।
वामदेवो१२६ हृषीकेश१२७स्ततो दामोदरो१२८ऽपरः ।। ३४।।
गोपालानन्द१२९तीर्थश्च गोविन्दा१३०ख्योपरस्ततः ।
तथा रघूत्तम१३१श्चान्यो रामचन्द्र१३२स्ततः परः ।। ३५ ।।
गोविन्दो१३३ रघुनाथ१३४श्च रामकृष्ण१३५स्ततोऽपरः ।
मधुसूदन१३६तीर्थश्च तथा दामोदरो१३७ऽपरः ।।३६ ।।
रघूत्तमः१३८ शिवो१३९ लोकनाथो१४० दामोदर१४१स्ततः ।
मधुसूदन१४२तीर्थाख्यस्तत आचार्य उच्यते ।। ३७।।
भारतीकृष्ण१४३तीर्थाख्यो गणितज्ञः प्रकीर्त्तितः ।
महामहिमगोभक्तो देवतीर्थो निरञ्जनः१४४ ।।३८ ।।
यतीन्द्रो निश्चलानन्द१४५सरस्वती ततः स्मृतः ।
आजन्मब्रह्मचारी यो भाति गोवर्द्धने मठे ।। ३९ ।।

पूर्व कर्मानुरूप नरजन्म तथा जन्मानुरूप वर्ण और वर्णानुरूप आश्रमकी व्यवस्था सनातन श्रौत स्मार्त – धर्म है। तदनुसार ब्राह्मण चारों आश्रमों में अधिकृत हैं। सन्यासके दशविध प्रभेद श्रीशिवावतार भगवत्पाद शङ्कराचार्यद्वारा ख्यापित हैं। अतः उनके श्रीपद्मपादादि सन्यासी शिष्य और श्रीपद्मपादादिके पीठासीन होनेके पूर्वके सन्यासी शिष्य दशनामी नहीं हो सकते। श्रीतोटक जिन्हें प्रतर्दनाचार्यके नामसे भी जाना जाता है, उन्हें विद्योपलब्धिके पूर्व जडताके कारण गिरि नामसे पुकारा जाता था। पुरीपीठसे सम्बद्ध वन, अरण्य; शृङ्गेरीपीठसे सम्बद्ध भारती, सरस्वती, पुरी; द्वारकापीठसे सम्बद्ध तीर्थ, आश्रम; ज्योतिष्पीठसे सम्बद्ध गिरि, पर्वत, सागर नामा सन्यासियोंमें एक पीठसे सम्बद्ध अरण्यादि किसी एक ही सन्यासी न होनेके कारण पीठासीन श्रीपद्मपादादिको किसी एक या एकाधिक नामसे ख्यापित करना सम्भव नहीं। अतः दशनामी सन्यासियोंको ख्यापित करनेमें एक – दो पीढ़ीका अन्तराल स्वाभाविक है।
इस सन्दर्भमें श्रीगोवर्द्धनमठके चौथे आचार्य श्रीविद्यारण्य और उन्नीसवें श्रीबृहदारण्य हुए हैं; अतः देहलीदीपन्यायसे पाँचवेंसे अट्ठारहवेंतक अरण्यनामा रहे हों, यह अधिक सम्भव है। बीसवें श्रीमहादेवतीर्थसे एक सौ चौवालीसवें श्रीनिरञ्जनदेवतीर्थ पर्यन्त तीर्थ नामा सन्यासी हुए हैं। श्रीगोवर्द्धनमठ – भोगवर्द्धन – पुरुषोत्तमक्षेत्र – विमलापीठका १४५ वाँ श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य मैं सर्वभूतहृदय धर्मसम्राट् श्रीहरिहरानन्दसरस्वती ‘करपात्री’ जीका सन्यासी शिष्य हूँ। भगवत्कृपासे मुझे धर्मसम्राट् और पुरीपीठाधीश्वर पूर्वाचार्यसे वेदान्तादि विविध शास्त्रोंके अध्ययनका कई वर्षों तक अद्भुत सुयोग सधा है। श्रीहरिगुरुकरुणाके अमोघ प्रभावसे पुरीपीठाधीश्वर – श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य निरञ्जनदेवतीर्थजीने अपने चिन्मय करकमलोंसे मेरा अभिषेक कर मुझे इस आचार्यपदपर प्रतिष्ठित किया है।
श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीकी आचार्य – परम्परा
युधिष्ठिरशक २६३१ वैशाखशुक्ल पञ्चमीके दिन अवतीर्ण श्रीशिवावतार भगवत्पाद शङ्कराचार्यने युधिष्ठिरशक २६५५; तदनुसार गतकलि २६१७ वैशाखशुक्ल दशमीके दिन अपने चिन्मय करकमलोंसे मूर्तिभञ्जकोंके शासनकालमें उच्छिन्न श्रीजगन्नाथादिको पुनः प्रतिष्ठित किया तथा अपने प्रथम शिष्य श्रीसनन्दनसंज्ञक पद्मपादको श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरुषोत्तमक्षेत्र – पुरीपीठपर अभिषिक्त किया। गतकलि २६१७ से गतकलि २६४२ तक श्रीपद्मपाद पदासीन रहे। अतः लगभग २५ वर्षों तक उनका पीठासीन कार्यकाल सिद्ध होता है। श्रीगोवर्द्धनमठकी स्थापना गतकलि २६१५ कार्तिकशुक्लपञ्चमी, तदनुसार पूर्व विक्रमसंवत् ४२८ – ४२९ बी. सी. ४८६ में हुई। अतः पीठसंरक्षणकाल बी. सी. ४८६ से बी. सी. ४५९ तक २७ वर्ष सिद्ध होते है।
|
क्रम |
नाम |
पर्यन्त |
अवधि लगभग |
|
०१. |
अनन्तश्री. पद्मपाद |
युधिष्ठिरशक २६५५; तदनुसार गतकलि २६१७, तुल्य ई. सन् पूर्व ४८४ से गतकलिसम्वत् २६४२; तुल्य ई. सन् पूर्व ४५९ |
२५ वर्ष |
|
०२. |
अनन्तश्री. शूलपाणि |
गतकलिसम्वत् २६६२; तुल्य ई.सन् पूर्व ४३९ |
२० वर्ष |
|
०३. |
अनन्तश्री. नारायण |
गतकलिसम्वत् २६७९; तुल्य ई.सन् पूर्व४२२ |
१७ वर्ष |
|
०४. |
अनन्तश्री. विद्यारण्य |
गतकलिसम्वत् २६९७; तुल्य ई.सन् पूर्व ४०४ |
१८ वर्ष |
|
०५. |
अनन्तश्री. वामदेव |
गतकलिसम्वत् २७१३; तुल्य ई.सन् पूर्व ३८८ |
१६ वर्ष |
|
०६. |
अनन्तश्री. पद्मनाभ |
गतकलिसम्वत् २७२८; तुल्य ई.सन् पूर्व ३७३ |
१५ वर्ष |
|
०७. |
अनन्तश्री. जगन्नाथ |
गतकलिसम्वत् २७४२; तुल्य ई.सन् पूर्व ३५९ |
१४ वर्ष |
|
०८. |
अनन्तश्री. मधुरेश्वर |
गतकलिसम्वत् २७५२; तुल्य ई.सन् पूर्व ३४९ |
१० वर्ष |
|
०९. |
अनन्तश्री. गोविन्द |
गतकलिसम्वत् २७७३; तुल्य ई.सन् पूर्व ३२८ |
२१ वर्ष |
|
१०. |
अनन्तश्री. श्रीधर |
गतकलिसम्वत् २७९१; तुल्य ई.सन् पूर्व ३१० |
१८ वर्ष |
|
११. |
अनन्तश्री. माधवानन्द |
गतकलिसम्वत् २८०८; तुल्य ई.सन् पूर्व २९३ |
१७ वर्ष |
|
१२. |
अनन्तश्री. कृष्णब्रह्मानन्द |
गतकलिसम्वत् २८२६; तुल्य ई.सन् पूर्व २७५ |
१८ वर्ष |
|
१३. |
अनन्तश्री. रामानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् २८४२; तुल्य ई.सन् पूर्व २५९ |
१६ वर्ष |
|
१४. |
अनन्तश्री. वागीश्वरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् २८५७; तुल्य ई.सन् पूर्व २४४ |
१५ वर्ष |
|
१५. |
अनन्तश्री. परमेश्वरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् २८७१; तुल्य ई.सन् पूर्व २३० |
१४ वर्ष |
|
१६ |
अनन्तश्री. गोपालतीर्थ |
गतकलिसम्वत् २८८३; तुल्य ई.सन् पूर्व २१८ |
१२ वर्ष |
|
१७. |
अनन्तश्री. जनार्दनतीर्थ |
गतकलिसम्वत् २८९७; तुल्य ई. सन् पूर्व २०४ |
१४ वर्ष |
|
१८. |
अनन्तश्री. ज्ञानानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् २९१७; तुल्य ई. सन् पूर्व १८४ |
२० वर्ष |
|
१९. |
अनन्तश्री. बृहदारण्य |
गतकलिसम्वत् २९३६; तुल्य ई.सन् पूर्व १६५ |
१९ वर्ष |
|
२०. |
अनन्तश्री. महादेवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् २९५४; तुल्य ई.सन् पूर्व १४७ |
१८ वर्ष |
|
२१. |
अनन्तश्री. ब्रह्मानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् २९७०; तुल्य ई.सन् पूर्व १३१ |
१६ वर्ष |
|
२२. |
अनन्तश्री. रामानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् २९८५; तुल्य ई.सन् पूर्व ११६ |
१५ वर्ष |
|
२३. |
अनन्तश्री. सदाशिवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् २९९९; तुल्य ई.सन् पूर्व १०२ |
१४ वर्ष |
|
२४. |
अनन्तश्री. हरीश्वरानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३०११; तुल्य ई.सन् पूर्व वर्ष ९० |
१२ वर्ष |
|
२५. |
अनन्तश्री. बोधानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३०२५; तुल्य ई.सन् पूर्व ७६ |
१४ वर्ष |
|
२६. |
अनन्तश्री. रामकृष्णतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३०४५; तुल्य ई.सन् पूर्व ५६ |
२० वर्ष |
|
२७. |
अनन्तश्री. चिद्बोधात्म तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३०५५; तुल्य ई.सन् पूर्व ४६ |
१० वर्ष |
|
२८. |
अनन्तश्री. तत्त्वाक्षरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३०७३; तुल्य ई. सन् पूर्व २८ |
१८ वर्ष |
|
२९. |
अनन्तश्री. शङ्करतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३०८९; तुल्य ई.सन् पूर्व १२ |
१६ वर्ष |
|
३०. |
अनन्तश्री. वासुदेवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३१०९; तुल्य ई.सन् ८ |
२० वर्ष |
|
३१. |
अनन्तश्री. हयग्रीवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३१२६; तुल्य ई.सन् २५ |
१७ वर्ष |
|
३२. |
अनन्तश्री. श्रुतीश्वरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३१४०; तुल्य ई.सन् ३९ |
१४ वर्ष |
|
३३. |
अनन्तश्री. विद्यानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३१६०; तुल्य ई.सन् ५९ |
२० वर्ष |
|
३४. |
अनन्तश्री. मुकुन्दानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३१७८; तुल्य ई.सन् ७७ |
१८ वर्ष |
|
३५. |
अनन्तश्री. हिरण्यगर्भ तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३१९७; तुल्य ई.सन् ९६ |
१९ वर्ष |
|
३६. |
अनन्तश्री. नित्यानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३२१५; तुल्य ई.सन् ११४ |
१८ वर्ष |
|
३७. |
अनन्तश्री. शिवानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३२३१; तुल्य ई.सन् १३० |
१६ वर्ष |
|
३८. |
अनन्तश्री. श्रीयोगीश्वर तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३२४९; तुल्य ई.सन् १४८ |
१८ वर्ष |
|
३९. |
अनन्तश्री. सुदर्शनतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३२६४; तुल्य ई.सन् १६३ |
१५ वर्ष |
|
४०. |
अनन्तश्री. व्योमकेश तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३२८१; तुल्य ई.सन् १८० |
१७ वर्ष |
|
४१. |
अनन्तश्री. दामोदरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३३०२; तुल्य ई.सन् २०१ |
२१ वर्ष |
|
४२. |
अनन्तश्री. योगानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३३२२; तुल्य ई.सन् पूर्व २२१ |
२० वर्ष |
|
४३. |
अनन्तश्री. गोलकेशतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३३४३; तुल्य ई.सन् २४२ |
२१ वर्ष |
|
४४. |
अनन्तश्री. श्रीकृष्णानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३३६१; तुल्य ई.सन् २६० |
१८ वर्ष |
|
४५. |
अनन्तश्री. देवानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३३८४; तुल्य ई.सन् २८३ |
२३ वर्ष |
|
४६. |
अनन्तश्री. चन्द्रचूडतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३३९९; तुल्य ई.सन् २९८ |
१५ वर्ष |
|
४७. |
अनन्तश्री. हलायुधतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३४१३; तुल्य ई.सन् ३१२ |
१४ वर्ष |
|
४८. |
अनन्तश्री. सिद्धसेव्यतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३४२८; तुल्य ई.सन् ३२७ |
१५ वर्ष |
|
४९. |
अनन्तश्री. तारकात्मा तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३४४८; तुल्य ई.सन् ३४७ |
२० वर्ष |
|
५०. |
अनन्तश्री. बोधायनतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३४६९; तुल्य ई.सन् ३६८ |
२१ वर्ष |
|
५१. |
अनन्तश्री. श्रीधरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३४८८; तुल्य ई. सन् ३८७ |
१९ वर्ष |
|
५२. |
अनन्तश्री. नारायणतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३५०६; तुल्य ई.सन् ४०५ |
१८ वर्ष |
|
५३. |
अनन्तश्री. सदाशिवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३५२१; तुल्य ई.सन् ४२० |
१५ वर्ष |
|
५४. |
अनन्तश्री. जयकृष्णतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३५३४; तुल्य ई.सन् ४३३ |
१३ वर्ष |
|
५५. |
अनन्तश्री. विरूपाक्षतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३५४५; तुल्य ई.सन् ४४४ |
११ वर्ष |
|
५६. |
अनन्तश्री. विद्यारण्यतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३५५२; तुल्य ई.सन् ४५१ |
०७वर्ष |
|
५७. |
अनन्तश्री. विश्वेश्वर तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३५७२; तुल्य ई.सन् ४७१ |
२० वर्ष |
|
५८. |
अनन्तश्री. विवुधेश्वर तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३५९५; तुल्य ई.सन् ४९४ |
२३ वर्ष |
|
५९. |
अनन्तश्री. महेश्वरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३६१६; तुल्य ई.सन् ५१५ |
२१ वर्ष |
|
६०. |
अनन्तश्री. मधुसूदनतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३६३५; तुल्य ई.सन् ५३४ |
१९ वर्ष |
|
६१. |
अनन्तश्री. रघूत्तमतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३६५०; तुल्य ई.सन् ५४९ |
१५ वर्ष |
|
६२. |
अनन्तश्री. रामचन्द्रतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३६६३; तुल्य ई.सन् ५६२ |
१३ वर्ष |
|
६३. |
अनन्तश्री. योगीन्द्रतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३६७४; तुल्य ई.सन् ५७३ |
११ वर्ष |
|
६४. |
अनन्तश्री. महेश्वरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३६८१; तुल्य ई.सन् ५८० |
०७ वर्ष |
|
६५. |
अनन्तश्री. ओङ्कारतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३७०८; तुल्य ई.सन् ६०७ |
२७ वर्ष |
|
६६. |
अनन्तश्री. नारायणतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३७३०; तुल्य ई.सन् ६२९ |
२२ वर्ष |
|
६७. |
अनन्तश्री. जगन्नाथतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३७५१; तुल्य ई.सन् ६५० |
२१ वर्ष |
|
६८. |
अनन्तश्री. श्रीधरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३७७०; तुल्य ई.सन् ६६९ |
१९ वर्ष |
|
६९. |
अनन्तश्री. रामचन्द्रतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३७८३; तुल्य ई. सन् ६८२ |
१३ वर्ष |
|
७०. |
अनन्तश्री. ताम्राक्षतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३७९५; तुल्य ई. सन् ६९४ |
१२ वर्ष |
|
७१. |
अनन्तश्री. उग्रेश्वरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३८१०; तुल्य ई. सन् ७०९ |
१५ वर्ष |
|
७२. |
अनन्तश्री. उद्दण्डतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३८२८; तुल्य ई.सन् ७२७ |
१८ वर्ष |
|
७३. |
अनन्तश्री. सङ्कर्षण तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३८५०; तुल्य ई.सन् ७४९ |
२२ वर्ष |
|
७४. |
अनन्तश्री. जनार्दनतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३८७१; तुल्य ई.सन् ७७० |
२१ वर्ष |
|
७५. |
अनन्तश्री. अखण्डात्म तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३८८४; तुल्य ई.सन् ७८३ |
१३ वर्ष |
|
७६. |
अनन्तश्री. दामोदरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३८९६; तुल्य ई. सन् ७९५ |
१२ वर्ष |
|
७७. |
अनन्तश्री. शिवानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३९११; तुल्य ई.सन् ८१० |
१५वर्ष |
|
७८. |
अनन्तश्री. श्रीगदाधरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३९२९; तुल्य ई.सन् ८२८ |
१८ वर्ष |
|
७९. |
अनन्तश्री. विद्याधरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३९५१; तुल्य ई.सन् ८५० |
२२ वर्ष |
|
८०. |
अनन्तश्री. वामनतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३९७२; तुल्य ई.सन् ८७१ |
२१ वर्ष |
|
८१. |
अनन्तश्री. श्रीशङ्करतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३९८६; तुल्य ई.सन् ८८५ |
१४ वर्ष |
|
८२. |
अनन्तश्री. नीलकण्ठतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ३९९७; तुल्य ई.सन् ८९६ |
११ वर्ष |
|
८३. |
अनन्तश्री. रामकृष्णतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४०१७; तुल्य ई.सन् ९१६ |
२० वर्ष |
|
८४. |
अनन्तश्री. रघूत्तमतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४०३७; तुल्य ई.सन् ९३६ |
२० वर्ष |
|
८५. |
अनन्तश्री. दामोदरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४०४७; तुल्य ई.सन् ९४६ |
१० वर्ष |
|
८६. |
अनन्तश्री. गोपालतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४०६०; तुल्य ई.सन् ९५९ |
१३ वर्ष |
|
८७. |
अनन्तश्री. मृत्युञ्जय तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४०८१; तुल्य ई.सन् ९८० |
२१ वर्ष |
|
८८. |
अनन्तश्री. गोविन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४१०३; तुल्य ई.सन् १००२ |
२२ वर्ष |
|
८९. |
अनन्तश्री. वासुदेवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४११५; तुल्य ई.सन् १०१४ |
१२ वर्ष |
|
९०. |
अनन्तश्री. गङ्गाधरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४१२७; तुल्य ई.सन् १०२६ |
१२ वर्ष |
|
९१. |
अनन्तश्री. सदाशिवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४१४८; तुल्य ई.सन् १०४७ |
२१ वर्ष |
|
९२. |
अनन्तश्री. वामदेवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४१७०; तुल्य ई.सन् १०६९ |
२२ वर्ष |
|
९३. |
अनन्तश्री. उपमन्युतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४१८५; तुल्य ई.सन् १०८४ |
१५ वर्ष |
|
९४. |
अनन्तश्री. हयग्रीवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४२०१; तुल्य ई.सन् ११०० |
१६ वर्ष |
|
९५. |
अनन्तश्री. हरितीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४२१९; तुल्य ई.सन् १११८ |
१८ वर्ष |
|
९६. |
अनन्तश्री. रघूत्तमतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४२३८; तुल्य ई.सन् ११३७ |
१९ वर्ष |
|
९७. |
अनन्तश्री. पुण्डरीकाक्ष तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४२४५; तुल्य ई.सन् ११४४ |
०७ वर्ष |
|
९८. |
अनन्तश्री. पराशङ्कर तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४२६१; तुल्य ई.सन् ११६० |
१६ वर्ष |
|
९९. |
अनन्तश्री. वेदगर्भतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४२७९; तुल्य ई.सन् ११७८ |
१८ वर्ष |
|
१००. |
अनन्तश्री. वेदान्तभास्कर |
गतकलिसम्वत् ४२९९; तुल्य ई.सन् ११९८ |
२० वर्ष |
|
१०१. |
अनन्तश्री. विज्ञानात्मा |
गतकलिसम्वत् ४३१९; तुल्य ई.सन् १२१८ |
२० वर्ष |
|
१०२. |
अनन्तश्री. शिवानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४३४०; तुल्य ई.सन् १२३९ |
२१ वर्ष |
|
१०३. |
अनन्तश्री. महेश्वरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४३६०; तुल्य ई.सन् १२५९ |
२० वर्ष |
|
१०४. |
अनन्तश्री. रामकृष्णतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४३७९; तुल्य ई.सन् १२७८ |
१९ वर्ष |
|
१०५. |
अनन्तश्री. वृषभध्वज तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४३९३; तुल्य ई.सन् १२९२ |
१४ वर्ष |
|
१०६. |
अनन्तश्री. शुद्धबोधतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४४०६; तुल्य ई.सन् १३०५ |
१३ वर्ष |
|
१०७. |
अनन्तश्री. सोमेश्वरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४४२६; तुल्य ई.सन् १३२५ |
२० वर्ष |
|
१०८. |
अनन्तश्री. वोपदेवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४४४७; तुल्य ई.सन् १३४६ |
२१ वर्ष |
|
१०९. |
अनन्तश्री. शम्भुतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४४६७; तुल्य ई.सन् १३६६ |
२० वर्ष |
|
११०. |
अनन्तश्री. भृगुतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४४८०; तुल्य ई.सन् १३७९ |
१३ वर्ष |
|
१११. |
अनन्तश्री. केशवानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४४९२; तुल्य ई. सन् १३९१ |
१२ वर्ष |
|
११२. |
अनन्तश्री. विद्यानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४५०६; तुल्य ई.सन् १४०५ |
१४ वर्ष |
|
११३. |
अनन्तश्री. वेदानन्दातीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४५२२; तुल्य ई.सन् १४२१ |
१६ वर्ष |
|
११४. |
अनन्तश्री. श्रीयोगानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४५३७; तुल्य ई.सन् १४३६ |
१५ वर्ष |
|
११५. |
अनन्तश्री. सुतपानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४५६१; तुल्य ई.सन् १४६० |
२४ वर्ष |
|
११६. |
अनन्तश्री. श्रीधरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४५७२; तुल्य ई.सन् १४७१ |
११ वर्ष |
|
११७. |
अनन्तश्री. जनार्दनतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४५९३; तुल्य ई.सन् १४९२ |
२१ वर्ष |
|
११८. |
अनन्तश्री. कामनाशानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४६०५; तुल्य ई.सन् १५०४ |
१२ वर्ष |
|
११९. |
अनन्तश्री. हरिहरानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४६२१; तुल्य ई.सन् १५२० |
१६ वर्ष |
|
१२०. |
अनन्तश्री. गोपालतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४६३६; तुल्य ई.सन् १५३५ |
१५ वर्ष |
|
१२१. |
अनन्तश्री. कृष्णानन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४६५२; तुल्य ई.सन् १५५१ |
१६ वर्ष |
|
१२२. |
अनन्तश्री. माधवानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४६७३; तुल्य ई.सन् १५७२ |
२१ वर्ष |
|
१२३. |
अनन्तश्री. मधुसूदनतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४६८६; तुल्य ई.सन् १५८५ |
१३ वर्ष |
|
१२४. |
अनन्तश्री. गोविन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४७०२; तुल्य ई.सन् १६०१ |
१६ वर्ष |
|
१२५. |
अनन्तश्री. रघूत्तमतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४७२२; तुल्य ई.सन् १६२१ |
२० वर्ष |
|
१२६. |
अनन्तश्री. वामदेवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४७३७; तुल्य ई.सन् १६३६ |
१५ वर्ष |
|
१२७. |
अनन्तश्री. हृषीकेशतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४७५०; तुल्य ई.सन् १६४९ |
१३ वर्ष |
|
१२८. |
अनन्तश्री. दामोदरातीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४७७५; तुल्य ई.सन् १६७४ |
२५ वर्ष |
|
१२९. |
अनन्तश्री. गोपालानन्द तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४७८७; तुल्य ई.सन् १६८६ |
१२ वर्ष |
|
१३०. |
अनन्तश्री. गोविन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४८०१; तुल्य ई.सन् १७०० |
१४ वर्ष |
|
१३१. |
अनन्तश्री. रघूत्तमतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४८२०; तुल्य ई.सन् १७१९ |
१९ वर्ष |
|
१३२. |
अनन्तश्री. रामचन्द्रतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४८४१; तुल्य ई.सन् १७४० |
२१ वर्ष |
|
१३३. |
अनन्तश्री. गोविन्दतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४८५६; तुल्य ई.सन् १७५५ |
१५ वर्ष |
|
१३४. |
अनन्तश्री. रघुनाथतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४८७१; तुल्य ई.सन् १७७० |
१५ वर्ष |
|
१३५. |
अनन्तश्री. रामकृष्णतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४८९२; तुल्य ई.सन् १७९१ |
२१ वर्ष |
|
१३६. |
अनन्तश्री. मधुसूदनतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४९०५; तुल्य ई.सन् १८०४ |
१३ वर्ष |
|
१३७. |
अनन्तश्री. दामोदरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४९२८; तुल्य ई.सन् १८२७ |
२३ वर्ष |
|
१३८. |
अनन्तश्री. रघूत्तमतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४९५०; तुल्य ई. सन् १८४९ |
२२ वर्ष |
|
१३९. |
अनन्तश्री. शिवतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४९७१; तुल्य ई.सन् १८७० |
२१ वर्ष |
|
१४०. |
अनन्तश्री. लोकनाथतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४९८४; तुल्य ई.सन् १८८३ |
१३ वर्ष |
|
१४१. |
अनन्तश्री. दामोदरतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ४९९९; तुल्य ई.सन् १८९८ |
१५ वर्ष |
|
१४२. |
अनन्तश्री. मधुसूदनतीर्थ |
गतकलिसम्वत् ५०२७; तुल्य ई.सन् १९२५ |
२७ वर्ष |
|
१४३. |
अनन्तश्री. भारतीकृष्ण तीर्थ |
गतकलिसम्वत् ५०६१; तुल्य ई. सन् १९६० |
३४ वर्ष |
|
१४४. |
अनन्तश्री. निरञ्जनदेव तीर्थ |
आषाढकृष्णषष्ठी बुधवार विक्रमसम्वत् २०२१;शकसम्वत् १८८६; तदनुसार १ जुलाई,१९६४. से माघशुक्ल – षष्ठी रविवार; विक्रमसम्वत् २०४८; तदनुसार ९ फरबरी १९९२ पर्यन्त |
२८ वर्ष |
|
१४५. |
अनन्तश्री. निश्चलानन्द सरस्वती |
माघशुक्लषष्ठी रविवार; विक्रमसम्वत् २०४८; तदनुसार ९ फरबरी १९९२को अभिजित् मुहूर्तमें श्रीनिरञ्जनदेवतीर्थके करकमलोंसे अभिषिक्त |
|

अनन्तश्री – विभूषित भारतीकृष्णतीर्थजीका जन्म १४ मार्च सन् १८८४ ; तदनुसार चैत्रकृष्णतृतीया शुक्रवार विक्रमसंवत् १९४०, शकसम्वत् १८०५ तिनोवेलीमें हुआ। उनका नाम व्यङ्कटरमण रखा गया। वे तमिल, संस्कृत, इंगलिश, मराठी, गुजराती, हिन्दी आदि चौदह भाषाओंके ; तद्वत् व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष, आयुर्वेद, यन्त्रशास्त्र एवम् गणित आदि विविध विषयोंके ख्यातिप्राप्त विद्वान् थे। १४ जुलाई, १९१९ तदनुसार श्रावणकृष्ण (शुक्लादि मासानुसार आषाढकृष्ण) प्रतिपदा सोमवार विक्रमसंवत् १९७८, शकसम्वत् १८४१ में वाराणसीमें द्वारकापीठाधीश्वर श्रीत्रिविक्रमतीर्थके द्वारा उनका सन्यास सम्पन्न हुआ। पुरीपीठके श्रीमज्जगदुरु शङ्कराचार्य मधुसूदनतीर्थजीसे उन्होंने २८ जून १९२५; तदनुसार आषाढशुक्ल सप्तमी रविवार विक्रमसंवत् १९८२, शकसम्वत् १८४७ को मन्त्रोपदेश प्राप्त किया। बम्बईमें २ फरबरी १९६०; माघशुक्ल पञ्चमी – षष्ठी मङ्गलवार विक्रमसंवत् २०१६, शकसम्वत् १८८१ को डेढ़बजे दिनमें उन्होंने देहत्याग किया। समुद्रतटपर बाणगङ्गामें उन्हें माघशुक्लषष्ठीके दिन भूसमाधि दी गयी।
पुरीपीठके श्रीमज्जगदुरु – शङ्कराचार्य मधुसूदनतीर्थजीसे उन्होंने २८ जून १९२५ के दिन मन्त्रोपदेश प्राप्त किया। उसी दिनसे उनका कार्यकाल मान्य है।
भारतीकृष्णतीर्थजीके ब्रह्मलीन होनेके पश्चात् उनकी भावनाके अनुसार ३० जून १९६४ तक द्वारका – शारदापीठके श्रीमज्जगदुरु शङ्कराचार्य अभिनव सच्चिदानन्दतीर्थ गोवर्द्धनमठका सञ्चालन करते रहे। ब्रह्मलीन भारतीकृष्णतीर्थजीके अन्तिम इच्छापत्रके अनुसार उन्होंने आषाढकृष्णषष्ठी बुधवार विक्रमसम्वत् २०२१; शकसम्वत् १८८६; तदनुसार १ जुलाई, १९६४ को इस पीठपर श्रीनिरञ्जनदेवतीर्थजीका विधिवत् अभिषेक किया।
पदासीनकालगणना
(ई. सन् पूर्व ४८३ से ई. सन् २०२६ तक)
२०२६ + ०४८३ = २५०९ वर्ष
— श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर-श्रीमज्जगद्गुरु-शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती
द्वारा लिखित पुस्तक “श्रीशिवावतार-भगवत्पाद-शङ्कराचार्य“
अध्याय “चतुराम्नाय – चतुष्पीठ – परम्परा” पृष्ठ संख्या १०२५ – १०४७

दक्षिणाम्नाय शृङ्गेरीशारदामठ गुरुपरम्परा

सन् १९७१ में दैवयोगसे अपने दो मित्रोंके सहित नैमिषारण्यसे शृङ्गेरी – पर्यन्त पदयात्राके सन्दर्भमें श्रीशङ्कराचार्यमहाभागकी जन्मभूमि कालदी (कालटी) के दर्शनका सुयोग सधा। वहाँ शारदामन्दिरकी भित्तिपर अङ्कित श्रीभगवत्पादका अवतारकाल दो हजारवर्ष पूर्व श्लोकबद्ध दृष्टिगोचर हुआ; परन्तु सन् २०१२ के एक वर्ष पूर्व राष्ट्रोत्कर्ष अभियानके सन्दर्भमें वहाँ पहुँचनेपर शिलालेख दृष्टिगोचर नहीं हुआ।
ध्यान रहे, ई. १८७९ से १९१२ पर्यन्त शृङ्गेरीमठके श्रीमज्जगदुरु शङ्कराचार्यपदपर समासीन श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनव नरसिंहभारतीके द्वारा श्रीशङ्कराचार्यमहाभागकी जन्मभूमि कालदी (कालटी) में श्री आदि शङ्कराचार्यमन्दिर तथा श्रीशारदामन्दिरका निर्माण कराया गया। इन यमज उपासनास्थलोंमें प्राणप्रतिष्ठासमारोह २१ फरवरी १९१० ई. सौम्यसम्वत्सर माघशुक्ल द्वादशीको सम्पन्न हुआ।

शारदामन्दिरकी भित्तिपर श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनव नरसिंहभारतीके द्वारा एक शिलालेख उत्कीर्ण करवाया गया था। वह शिलालेख १९७१ के बाद विलुप्त कर दिया गया। सौभाग्यवश १९६६ ई. सन् में पालघाटके नारायणनद्वारा प्रकाशित तथा प्रोफेसर के. आर. वेङ्कटरमणद्वारा सम्पादित कृति ‘कालदी’ में उक्त शिलालेखका १८ श्लोकोंसे युक्त पाठ प्रकाशित किया गया है; जिसमें शृङ्गगिरिमठके श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य श्री अभिनव विद्यातीर्थजीका ८.१.१९६६ तिथ्यङ्कित आशीर्वचन भी सन्निहित है। ‘कालदी’ के संस्कृतखण्ड पृष्ठ १ तथा २ में समुद्धृत उक्त शिलालेखके प्रथम आठ श्लोकोंका मूलपाठ हिन्दी अनुवादसहित यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। –
श्रीशारदामन्दिर कालटी प्रतिष्ठापित शिलालिखिताः श्लोकाः
प्रायशो वर्षसाहसद्वितयात् प्राक्सदाशिवः ।
दृष्ट्वाऽधर्मेण धर्मस्य ग्लानिं सर्वत्र भूतले ।। १ ।।
कालट्यां केरले श्रीमच्छङ्कराचार्यसंज्ञया ।
प्राप्य जन्म स्वप्रतिज्ञापालनार्थमिवादरत् ।।२।।
विजित्य सर्वान् वादेन दुर्मताविष्टचेतसः ।
आविष्कृत्यासमन्ताद्वै वैदिकं धर्ममुत्तमम् ।।३।।
विशुद्धाद्वैतविज्ञानमासेतुहिमशैलकम् ।
स्वयं संबोध्यबहुशः कृत्वा चात्मवशवदान्।।४।।
जुगोप धर्म तेनास्मानितिवृत्तं पुरातनम् ।
ज्ञात्वाप्याचार्यचारित्रबोधकग्रन्थराशिभिः । ।५।।
अकृतज्ञा वयं मोहान्न स्मरामो जगद्गुरुम् ।
तेन पापेन चास्माकं विविधापत्तिसम्भवः ।।६।।
इत्यालोच्य महायोगी हितैषी जगतां सदा ।
श्रीगुरुः सच्चिदानन्दशिवाभिनवपूर्वकः ।।७।।
नृसिंहभारतीस्वामी दक्षिणाशामठाधिपः ।
कृतघ्नतानिरासाय जनताभ्युदयाय च।८।।
“प्रायः दो हजार वर्षपूर्व सदाशिव भगवान् शङ्कर विश्वमें सर्वत्र अधर्मके द्वारा धर्मकी ग्लानिको देखकर केरलके कालटी नामक गाँव जन्म लेकर श्रीशङ्कराचार्यके नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने अपनी प्रतिज्ञाके पालनहेतु सार्थक सत्प्रयासके सन्दर्भमें वेदविरुद्ध समस्त मतावलम्बियोंको शास्त्रार्थमें परास्तकर उत्कृष्ट वैदिक सनातनधर्मको पुनः सुप्रतिष्ठित किया। उन्होंने रामेश्वरम् से हिमालयपर्यन्त मण्डलब्राह्मणादि वेदान्तसम्मत विशुद्ध अद्वैत विज्ञानके रस रहस्यको ख्यापितकर सबको उसके प्रति आकृष्ट और अनुगत किया। उन्होंने धर्मकी रक्षा तथा प्रतिष्ठाकर हम सबकी रक्षा की। भगवत्पादके पूर्वकालीन इस पावन वृत्तको अनेक ऐतिहासिक ग्रन्थोंसे जानकर भी मोहवश (प्रमादवश) अकृतज्ञ हम उनका स्मरण नहीं करते; अत एव हम पर विविध विपत्तियाँ आती हैं। ऐसा विचारकर विश्वहितकी कामनासे दक्षिणाम्नाय शृङ्गेरीपीठाधीश्वर महायोगी श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य श्रीसच्चिदानन्द – शिवाभिनव नरसिंहभारतीने कृतघ्नताको निरस्त करनेके लिए तथा जनताके अभ्युदयकी भावनासे इस महत्त्वपूर्ण वृत्तको प्रकाशित किया है।।”
बृहच्छङ्करविजयके अनुसार श्रीभगवत्पाद शङ्कराचार्यके गुरुदेव योगीन्द्र श्रीगोविन्दपादाचार्यका देहावसान युधिष्ठिरशक २६४६ प्लवङ्गसम्वत्सर कार्तिकपूर्णिमा गुरुवार सिद्ध है। –
शास्त्र श्रुत्यङ्गनेत्राब्दे युधिष्ठिरशकस्य वै।
प्लवने कार्तिके मासि पूर्णिमायां गुरोर्दिने ।।
श्रीमद्गौडपादार्यशिष्यो योगविदाम्वरः ।
गोविन्दभगवत्पादः सिद्धिं प्राप स संयमी ।।
(बृहच्छङ्करविजय)
अतः श्रीशङ्कराचार्यका जन्म तथा संन्यास युधिष्ठिरशक २६४६; तदनुसार ई. सन् से ४९२ वर्ष पूर्वके पूर्व सुनिश्चित है।
वेङ्कटेश्वरप्रेस – बम्बईसे विक्रमी १९७० में प्रकाशित आनन्दगिरि, भामती तथा रत्नप्रभासहित ब्रह्मसूत्र – शाङ्करभाष्यके प्रथमभागकी भूमिकामें ‘श्रीशङ्कराचार्यचरित्रम्’ के लेखक पण्डित श्रीसुब्रह्मण्यशास्त्रीके सुपुत्र श्रीवेङ्कटाचलशर्माने ५४ – ५५वें पृष्ठपर श्रीशङ्कराचार्यके जन्मकालके सम्बन्धमें कदली – ब्राह्मणोंका मत दो हजार वर्ष पूर्व बताया है। –
‘वर्षसहस्रद्वयात्प्राक् श्रीमच्छङ्कराचार्यः बभूव, इति कदलीब्रह्मणाः आहुः ।’
‘पतञ्जलिचरितम्’ के रचयिता आदित्यराजाके पिता श्रीरामभद्र कविने विक्रमी १९७१ में श्रीगोविन्दभगवत्पादके शिष्य श्रीशङ्कराचार्यका प्रादुर्भाव विक्रमादित्यके पूर्व अर्थात् न्यूनाधिक दो हजार वर्ष पूर्व माना है। –
‘गोविन्दभगवत्पादः श्रीमच्छङ्कराचार्यस्य गुरुः । इदानीं विक्रमार्कशकस्य सप्तत्युत्तर नवशत्यधिकसहस्रवर्षाणि गतानि । विक्रमार्कराज्यसमयेऽस्य शकस्यारम्भात् प्रागेवाचार्याणां जन्मेति । किं च न्यूनाधिक्येन द्विसहस्रवर्षाणि गतान्याचार्यसमयादिति प्रतीयते ।।’
श्रीवैङ्कटाचलशर्माद्वारा ईसवी सन् १९१४ में विरचित ‘श्रीमच्छङ्कराचार्यचरित्रम्’ नामक ग्रन्थमें प्रकाशित सूचीके अनुसार १. श्रीशङ्कराचार्यका संन्यास २२ विक्रमी, ईसवी सन् ७८ – ७९ अर्थात् शाङ्करसम्वत् १ तथा २. श्रीसुरेश्वराचार्यका संन्यास ३० विक्रमी अर्थात् शाङ्करसम्वत् ८ मान्य है। ३१.वें श्रीनृसिंहभारती (८) का समापनकाल १८२३ विक्रमी अर्थात् शाङ्करसम्वत् १८०१ मान्य है। तदनन्तर –
३२. श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनवविद्यानरसिंहभारती शाङ्करसम्वत् १८३४
३३. श्रीचन्द्रशेखर भारती (४) शाङ्करसम्वत् १८७६
३४. श्री अभिनवविद्यातीर्थ शाङ्करसम्वत् २०२४
३५. श्रीभारतीतीर्थ ई.स. १९८९, विक्रमसम्वत् २०४६, शाङ्करसम्वत् २०२४
से ग्रन्थरचनावर्ष विक्रमसम्वत् २०६९; तुल्य ई. सन् २०१२ तक
श्रीसुरेश्वराचार्यका संन्यास और पदासीन ३० विक्रमीसे वर्तमान २०६९ विक्रमी पर्यन्त २०३९ वर्ष श्रीशारदाशृङ्गेरीमठका कार्यकाल सिद्ध होता है।
ध्यान रहे, श्रीसुरेश्वराचार्यका संन्यासवर्ष ही उनके पदासीन होनेका वर्ष भी सिद्ध है। श्रीसुरेश्वराचार्यका पदासीनकाल शाङ्करसम्वत् ८ से ६९५ तक तथा तदनन्तर श्रीनित्यबोधघनाचार्यका पदासीनकाल शाङ्करसम्वत् ६९५ से ७७० पर्यन्त ७५ वर्ष सिद्ध होता है।
उक्त रीतिसे आचार्य शङ्करका जन्म विक्रमाब्द १४, ई.सन् ७१ सिद्ध होता है। श्रीसुरेश्वराचार्यका पदासीनकाल शाङ्करसम्वत् ८ से ६९५ तक ६९५ – ८ = ६८७ वर्ष सिद्ध होता है। श्रीसुरेश्वराचार्यकी पूर्णायु ७२५ माननेपर ७२५ – ६८७ = ३८ वर्षकी आयुमें उनका गृहत्याग, संन्यास तथा अभिषेककाल सिद्ध होता है। श्रीसुरेश्वराचार्यका संन्यास ३० विक्रमी अर्थात् शाङ्करसम्वत् ८ मान्य है। अतः श्रीसुरेश्वराचार्यका जन्म विक्रमसम्वत् से ८ वर्ष पूर्व सिद्ध होता है।
उक्त रीतिसे आचार्य श्रीशङ्करका जन्म विक्रमाब्द १४ में तथा श्रीसुरेश्वराचार्यका जन्म विक्रमसम्वत् से ८ वर्ष पूर्व मान्य होनेके कारण श्रीशङ्कराचार्यसे आयुमें श्रीसुरेश्वराचार्य १४ योग ०८ = २२ वर्ष अधिक सिद्ध होते हैं।

ईसवी सन् १९६६ में प्रकाशित ‘महान् तपस्वी’ ग्रन्थकी सूचीके अनुसार
शृङ्गेरीमठकी अर्वाचीन आचार्य – परम्परा
|
क्रम |
नाम |
पदासीन |
वर्ष |
|
०१. |
अनन्तश्री. सुरेश्वराचार्य |
शाङ्करसम्वत् ८; ई.सन् ८६से ६९५ अर्थात् ७७३ ईसवी सन् तक |
६८७ वर्ष. |
|
०२. |
अनन्तश्री. नित्यबोधघनाचार्य |
शाङ्करसम्वत् ६९५ से ७७० पर्यन्त; तुल्य ८४८ ईसवी सन् तक |
०७५ वर्ष. |
|
०३. |
अनन्तश्री. ज्ञानघनाचार्य |
८३२ शाङ्करसम्वत्; तुल्य ९१० ईसवी सन् |
०६२ वर्ष. |
|
०४. |
अनन्तश्री. ज्ञानोत्तमाचार्य |
७७५ शाङ्करसम्वत्; तुल्य ९५३ ईसवी सन् |
०४३ वर्ष. |
|
०५. |
अनन्तश्री. ज्ञानगिर्याचार्य |
९६० शाङ्करसम्वत्; तुल्य १०३८ ईसवी सन् |
०८५ वर्ष. |
|
०६. |
अनन्तश्री. सिंहगिर्याचार्य |
१०२० शाङ्करसम्वत्; तुल्य १०९८ ईसवी सन् |
०६० वर्ष. |
|
०७. |
अनन्तश्री. ईश्वरतीर्थ |
१०६८ शाङ्करसम्वत्; तुल्य ११४६ ईसवी सन् |
०४८ वर्ष. |
|
०८. |
अनन्तश्री. नरसिंहतीर्थ |
११५० शाङ्करसम्वत्; तुल्य १२२८ ईसवी सन् |
०८२ वर्ष. |
|
०९. |
अनन्तश्री. विद्याशङ्करतीर्थ |
शाङ्करसम्वत् १२५५; तुल्य १३३३ ईसवी सन् |
१०५ वर्ष. |
|
१०. |
अनन्तश्री. भारतीकृष्णतीर्थ |
शाङ्करसम्वत् १३०२; तुल्य १३८० ईसवी सन् |
०४७ वर्ष. |
|
११. |
अनन्तश्री. विद्यारण्य |
शाङ्करसम्वत् १३०८; तुल्य १३८६ ईसवी सन् |
००६ वर्ष. |
|
१२. |
अनन्तश्री. चन्द्रशेखरभारती (१) |
शाङ्करसम्वत् १३११; तुल्य १३८९ ईसवी सन् |
००३ वर्ष |
|
१३. |
अनन्तश्री. नरसिंहभारती (१) |
शाङ्करसम्वत् १३३०; तुल्य १४०८ ईसवी सन् |
०१९ वर्ष. |
|
१४. |
अनन्तश्री. चन्द्रशेखरभारती (२) |
शाङ्करसम्वत् १३३०; तुल्य १४०८ ईसवी सन् |
मात्र कुछ दिन, ००० वर्ष. |
|
१५. |
अनन्तश्री. पुरुषोत्तमभारती (१) |
शाङ्करसम्वत् १३७०; तुल्य १४४८ ईसवी सन् |
०४० वर्ष. |
|
१६. |
अनन्तश्री. शङ्करानन्दभारती |
शाङ्करसम्वत् १३७६; तुल्य १४५४ ईसवी सन् |
००६ वर्ष. |
|
१७. |
अनन्तश्री. चन्द्रशेखरभारती (३) |
वर्ष. शाङ्करसम्वत् १३८६; तुल्य १४६४ ईसवी सन् |
०१० वर्ष. |
|
१८. |
अनन्तश्री. नरसिंहभारती (२) |
शाङ्करसम्वत् १४०१; तुल्य १४७९ ईसवी सन् |
०१५वर्ष. |
|
१९. |
अनन्तश्री. पुरुषोत्तमभारती (२) |
शाङ्करसम्वत् १४३९; तुल्य १५१७ ईसवी सन् |
०३८ वर्ष. |
|
२०. |
अनन्तश्री. रामचन्द्रभारती |
शाङ्करसम्वत् १४८२; तुल्य १५६० ईसवी सन् |
०४३ वर्ष. |
|
२१. |
अनन्तश्री. नरसिंहभारती (३) |
शाङ्करसम्वत् १४९८; तुल्य १५७६ ईसवी सन् |
०१६ वर्ष. |
|
२२. |
अनन्तश्री. नरसिंहभारती (४) |
शाङ्करसम्वत् १५२१; तुल्य १५९९ ईसवी सन् |
०२३ वर्ष. |
|
२३. |
अनन्तश्री. नरसिंहभारती (५) |
शाङ्करसम्वत् १५४४; तुल्य १६२२ ईसवी सन् |
०२३ वर्ष. |
|
२४. |
अनन्तश्री. सच्चिदानन्दभारती (१) |
शाङ्करसम्वत् १५८५; तुल्य १६६३ ईसवी सन् |
०४१ वर्ष. |
|
२५. |
अनन्तश्री. नरसिंहभारती (६) |
शाङ्करसम्वत् १६२७; तुल्य १७०५ ईसवी सन् |
०४२ वर्ष. |
|
२६. |
अनन्तश्री. सच्चिदानन्दभारती (२) |
शाङ्करसम्वत् १६६३; तुल्य १७४१ ईसवी सन् |
०३६ वर्ष. |
|
२७. |
अनन्तश्री. अभिनव सच्चिदानन्दभारती (१) |
१६८९ शाङ्करसम्वत्; तुल्य १७६७ ईसवी सन् |
०२६ वर्ष. |
|
२८. |
अनन्तश्री. नरसिंहभारती (७) |
शाङ्करसम्वत् १६९२; तुल्य १७७० ईसवी सन् |
००३वर्ष. |
|
२९. |
अनन्तश्री. सच्चिदानन्द |
शाङ्करसम्वत् १७३६; तुल्य १८१४ ईसवी सन् |
०४४ वर्ष. |
|
३०. |
अनन्तश्री. अभिनव सच्चिदानन्दभारती (२) |
१७३९ शाङ्करसम्वत्; तुल्य १८१७ ईसवी सन् |
००३ वर्ष. |
|
३१. |
अनन्तश्री. नरसिंहभारती (८) |
शाङ्करसम्वत् १८०१; तुल्य १८७९ ईसवी सन् |
०६२ वर्ष. |
|
३२. |
अनन्तश्री. सच्चिदानन्दशिवाभिनव नरसिंहभारती |
१८३४ शाङ्करसम्वत्; तुल्य १९१२ ईसवी सन् |
०३३ वर्ष. |
|
३३. |
अनन्तश्री. चन्द्रशेखरभारती (४) |
१८७६ शाङ्करसम्वत्; तुल्य १९५४ ईसवी सन् |
०४२ वर्ष. |
|
३४. |
अनन्तश्री. अभिनवविद्यातीर्थ |
शाङ्करसम्वत् १९११; तुल्य १९८९ ईसवी सन् |
०३५ वर्ष. |
|
३५. |
अनन्तश्री. भारतीतीर्थ |
(ग्रन्थरचनावर्ष विक्रमसम्वत् २०६९; |
०२३ वर्ष. |
शृङ्गेरीशारदामठ महत्त्वपूर्ण तथ्य

पदासीनकाल
१९२६ वर्ष प्राप्त; २०३९ अपेक्षित;
अतः २०३९ ऋण १९२६ = ११३ वर्ष न्यून
अतएव विक्रमी ३० योग ११३ अपेक्षित = विक्रमी १४३ शृङ्गेरीमठके अनुसार श्रीसुरेश्वराचार्यका पदारूढ़ वर्ष सिद्ध है; न कि विक्रमी ३०.
विक्रमी १९५३ (इ.स. १८९७) में निर्णयसागरप्रेस बम्बई (मुम्बई) से प्रकाशित पञ्चदशीकी पीताम्बरीटीकाकी भूमिका सन्निहितसूची जो कि शृङ्गेरीमठकी कूडलीशाखाके अनुरूप है; उसमें श्रीपृथ्वीधराचार्य अर्थात् श्रीसुरेश्वराचार्यका समापनकाल शाङ्करसम्वत् ३७; ई.स. ११५ पर्यन्त कुल ६५ वर्ष मान्य है।
काञ्चीकामकोटिने प्रथमाचार्यके रूपमें आदि शङ्कराचार्यको मानकर उनका जीवनकाल ईसवीपूर्व ५०८ से ४७६ कुल ३२ वर्ष माना है। तदनन्तर ई. पूर्व ४७६ से ४०६ तक कुल ७० वर्षोंतक श्रीसुरेश्वराचार्यको पदासीन माना है।
द्वारका – शारदापीठने युधिष्ठिरशक २६४९ माघकृष्ण ७ ई.पूर्व ४८९से युधिष्ठिरशक २६९१ चैत्रकृष्ण ८; तुल्य ई.पूर्व ४४७ पर्यन्त कुल ४२ वर्षोंतक श्रीसुरेश्वराचार्यको पदासीन माना है।

इस प्रकार कहाँ ६५, ७०, ४२ वर्षोंकी अवधि और कहाँ ६८७ वर्षोंकी अवधि ? दोनों में कोई तालमेल नहीं है। तद्वत् कहाँ श्रीभगवत्पादका ई. सन् से ५०७ – ५०९ पूर्व प्रादुर्भावकाल और कहाँ १४ विक्रमाब्द (७० ई.सन्) प्रादुर्भावकाल? दोनों में कोई तालमेल नहीं है।
इतना ही नहीं; जयपुर – विश्वनाथ – राजगोपतलशर्मा द्वारा सम्पादित १९६३ में प्रकाशित ‘श्रीमज्जगद्गुरु – शाङ्करमठविमर्श’ पृष्ठ २५, पैरा २ के अनुसार आचार्य शङ्करद्वारा प्रतिष्ठित दक्षिणाम्नाय शृङ्गेरीमठकी गुरुपरम्पराके अनुसार आचार्य शङ्करका जन्म १४ विक्रमाब्दमें, तथा तिरोधान ४६ विक्रमाब्दमें हुआ।’……………………………अतः लोकमान्य श्रीबालगङ्गाधरतिलकजीका अनुमान सत्य प्रतीत होता है कि शृङ्गेरीकी पूर्वोक्त परम्परामें शङ्करका काल – उल्लेख चालुक्यवंशीय विक्रमादित्य एकसे सम्बन्ध रखता है। अतः इस आधारसे सिद्ध होता है कि आचार्यका जन्म ६६४ ईसवी तथा निर्याण ७१६ ईसवी का है।
तिलकजीकी अनर्गल मान्यताके पक्षधर शर्माजीने शृङ्गेरीमठके पदासीन आचार्योंकी की ईसवी सन् २०१२ तक सिद्ध १९२६ वर्षकी अवधिके १३ वर्ष पूर्व शङ्कराचार्यके प्रादुर्भावकालकालका ध्यान बिल्कुल नहीं रखा।
उक्तरीतिसे श्रीभगवत्पादका ईसवी सन् से ५०७ – ५०९ पूर्व प्रादुर्भावकाल सर्वथा युक्त परिलक्षित होता है।
चैत्रशुक्ल १ शुक्रवार वि.स. २०६९; तदनुसार २३ मार्च, २०१२
स्वस्तिक भवन, स्मृतिनगर, भिलाई दुर्ग (छ.ग.)
— श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर-श्रीमज्जगद्गुरु-शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती
द्वारा लिखित पुस्तक “श्रीशिवावतार-भगवत्पाद-शङ्कराचार्य“
अध्याय “चतुराम्नाय – चतुष्पीठ – परम्परा” पृष्ठ संख्या १०६६ – १०७६

पश्चिमाम्नाय – द्वारकामठ – गुरुपरम्परा

पश्चिमाम्नाय – द्वारकामठ – गुरुपरम्परा
|
क्रम |
योगपट्ट |
पर्यन्त |
पीठासीन काल लगभग |
|
०१. |
अनन्तश्री. सुरेश्वराचार्य |
युधिष्ठिरशक २६४९ माघकृष्ण ७ ; ई. पूर्व ४८९ से युधिष्ठिरशक २६९१ चैत्रकृष्ण ८; तुल्य ई. पूर्व ४४७ पर्यन्त |
४२ वर्ष. |
|
०२. |
अनन्तश्री. चित्सुखाचार्य |
युधिष्ठिरशक २७१५ पौषशुक्ल ३; तुल्य ई. पूर्व ४२३ |
२४ वर्ष. |
|
०३. |
अनन्तश्री. सर्वज्ञानाचार्य |
युधिष्ठिरशक २७७४ श्रावणशुक्ल ११; तुल्य ई. पूर्व ३६४ |
५९ वर्ष. |
|
०४. |
अनन्तश्री. ब्रह्मान्दतीर्थ |
युधिष्ठिरशक २८२३ श्रावणशुक्ल १; तुल्य ई. पूर्व ३१५ |
४९ वर्ष. |
|
०५. |
अनन्तश्री. स्वरूपाभि ज्ञानाचार्य |
युधिष्ठिरशक २८९० ज्येष्ठ अमावास्या; तुल्य ई. पूर्व २४८ |
६७ वर्ष. |
|
०६. |
अनन्तश्री. मङ्गल मूर्त्याचार्य |
युधिष्ठिरशक २९४२ पौषशुक्ल १४; तुल्य ई. पूर्व १९६ |
५२ वर्ष. |
|
०७. |
अनन्तश्री. भास्कराचार्य |
युधिष्ठिरशक २९६५ पौषशुक्ल १२; तुल्य ई. पूर्व १७३ |
२३ वर्ष. |
|
०८. |
अनन्तश्री. प्रज्ञानाचार्य |
युधिष्ठिरशक ३००८ आषाढशुक्ल ७; तुल्य ई. पूर्व १३० |
४३ वर्ष. |
|
०९. |
अनन्तश्री. ब्रह्मज्योत्स्नाचार्य |
युधिष्ठिरशक ३०४० चैत्रकृष्ण ४; तुल्य ई. पूर्व ९८ |
३२ वर्ष. |
|
१०. |
अनन्तश्री. आनन्दा विर्भावाचार्य |
विक्रमसम्वत् ९ फाल्गुनशुक्ल ९; तुल्य ई. पूर्व ४७ |
५१ वर्ष. |
|
११. |
अनन्तश्री. कलानिधितीर्थ |
विक्रमसम्वत् ८२ फाल्गुनशुक्ल ६; तुल्य ई. सन् २६ |
७३ वर्ष. |
|
१२. |
अनन्तश्री. चिद्विलासाचार्य |
विक्रमसम्वत् ११९ मार्गशीर्षशुक्ल १३; तुल्य ई. सन् ६३ |
३७ वर्ष. |
|
१३. |
अनन्तश्री. विभूत्यानन्दाचार्य |
विक्रमसम्वत् १५४ श्रावणकृष्ण ११; तुल्य ई. सन् ९८ |
३५ वर्ष. |
|
१४. |
अनन्तश्री. स्फूर्त्तिनिलयपाद |
विक्रमसम्वत् २०३ आषाढशुक्ल ६; तुल्य ई. सन् १४७ |
४९ वर्ष. |
|
१५. |
अनन्तश्री. वरतन्तुपाद |
विक्रमसम्वत् २५९ आषाढकृष्ण ३; तुल्य ई. सन् २०३ |
५६ वर्ष. |
|
१६. |
अनन्तश्री. योगारूढाचार्य |
विक्रमसम्वत् ३६० मार्गशीर्षकृष्ण ११; तुल्य ई. सन् ३०४ |
१०१ वर्ष. |
|
१७. |
अनन्तश्री. विजय डिण्डिमाचार्य |
विक्रमसम्वत् ३९४ पौषकृष्ण ८; तुल्य ई. सन् ३३८ |
३४ वर्ष. |
|
१८. |
अनन्तश्री. विद्यातीर्थ |
विक्रमसम्वत् ४३७ आषाढशुक्ल १२; तुल्य ई. सन् ३८१ |
४३ वर्ष. |
|
१९. |
अनन्तश्री. चिच्छक्तिदेशिक |
विक्रमसम्वत् ४३८ आषाढशुक्ल १२; तुल्य ई. सन् ३८२ |
०१ वर्ष. |
|
२०. |
अनन्तश्री. विज्ञानेश्वरतीर्थ |
विक्रमसम्वत् ५११ आषाढशुक्ल १५; तुल्य ई. सन् ४५५ |
७३ वर्ष. |
|
२१. |
अनन्तश्री. ऋतम्भराचार्य |
विक्रमसम्वत् ५७२ माघशुक्ल १०; तुल्य ई. सन् ५१६ |
६१ वर्ष. |
|
२२. |
अनन्तश्री. अमरेश्वरगुरु |
विक्रमसम्वत् ६०८ भाद्रपदकृष्ण ६; तुल्य ई. सन् ५५२ |
३६ वर्ष. |
|
२३. |
अनन्तश्री. सर्वतोमुख तीर्थ |
विक्रमसम्वत् ६६९ पौषशुक्ल ४; तुल्य ई. सन् ६१३ |
६१ वर्ष. |
|
२४. |
अनन्तश्री. आनन्ददेशिक |
विक्रमसम्वत् ७२१ वैशाखकृष्ण ५; तुल्य ई. सन् ६६५ |
५२ वर्ष. |
|
२५. |
अनन्तश्री. समाधिरसिक |
विक्रमसम्वत् ७९९ फाल्गुन शुक्ल १२; तुल्य ई. सन् ७४३ |
७८ वर्ष. |
|
२६. |
अनन्तश्री. नारायणाश्रम |
विक्रमसम्वत् ८३६ चैत्रशुक्ल १४; तुल्य ई. सन् ७८० |
३७ वर्ष. |
|
२७. |
अनन्तश्री. वैकुण्ठाश्रम |
विक्रमसम्वत् ८८५ आषाढकृष्ण ६;तुल्य ई. सन् ८२९ |
४९ वर्ष. |
|
२८. |
अनन्तश्री. विक्रमाश्रम |
विक्रमसम्वत् ९११ आषाढशुक्ल ३; तुल्य ई. सन् ८५५ |
२६ वर्ष. |
|
२९. |
अनन्तश्री. नृसिंहाश्रम |
विक्रमसम्वत् ९६०; तुल्य ई. सन् ९०४ |
४९ वर्ष. |
|
३०. |
अनन्तश्री. त्र्यम्बकाश्रम |
विक्रमसम्वत् ९६५; तुल्य ई. सन् ९०९ |
०५ वर्ष. |
|
३१. |
अनन्तश्री. विष्णवाश्रम |
विक्रमसम्वत् १००१ ज्येष्ठशुक्ल १; तुल्य ई. सन् ९४५ |
३६ वर्ष. |
|
३२. |
अनन्तश्री. केशवाश्रम |
विक्रमसम्वत् १०६०; तुल्य ई. सन् १००४ |
५९ वर्ष. |
|
३३. |
अनन्तश्री. चिदम्बराश्रम |
विक्रमसम्वत् १०८३ मार्गशीर्षकृष्ण ९; तुल्य ई. सन् १०२७ |
२३ वर्ष. |
|
३४. |
अनन्तश्री. पद्मनाभाश्रम |
विक्रमसम्वत् ११०९ ज्येष्ठशुक्ल १५; तुल्य ई. सन् १०५३ |
२६ वर्ष. |
|
३५. |
अनन्तश्री. महादेवाश्रम |
विक्रमसम्वत् ११४८ श्रावणकृष्ण ९; तुल्य ई. सन् १०९२ |
३९ वर्ष. |
|
३६. |
अनन्तश्री. सच्चिदानन्दाश्रम |
विक्रमसम्वत् १२०७ आश्विनकृष्ण ५; तुल्य ई. सन् ११५१ |
५९ वर्ष. |
|
३७. |
अनन्तश्री. विद्या शङ्कराश्रम |
विक्रमसम्वत् १२६५ आश्विनकृष्ण ४; तुल्य ई. सन् १२०९ |
५८ वर्ष. |
|
३८. |
अनन्तश्री. अभिनव सच्चिदानन्दाश्रम |
विक्रमसम्वत् १२९३ वैशाखशुक्ल ६; तुल्य ई. सन् १२३७ |
२८ वर्ष. |
|
३९. |
अनन्तश्री. शशिशेखराश्रम |
विक्रमसम्वत् १३२६ वैशाखशुक्ल १; तुल्य ई. सन् १२७० |
३३ वर्ष. |
|
४०. |
अनन्तश्री. वासुदेवाश्रम |
विक्रमसम्वत् १३६२ फाल्गुनकृष्ण १०; तुल्य ई. सन् १३०६ |
३६ वर्ष |
|
४१. |
अनन्तश्री. पुरुषोत्तमाश्रम |
विक्रमसम्वत् १३९४ माघकृष्ण ५; तुल्य ई. सन् १३३८ |
३२ वर्ष. |
|
४२. |
अनन्तश्री. जनार्दनाश्रम |
विक्रमसम्वत् १४०८ भाद्रपदशुक्ल १५; तुल्य ई. सन् १३५२ |
१४ वर्ष. |
|
४३. |
अनन्तश्री. हरिहराश्रम |
विक्रमसम्वत् १४११ श्रावणशुक्ल ११; तुल्य ई. सन् १३५५ |
०३ वर्ष. |
|
४४. |
अनन्तश्री. भवाश्रम |
विक्रमसम्वत् १४२१ वैशाखकृष्ण ५; तुल्य ई. सन् १३६५ |
१० वर्ष. |
|
४५. |
अनन्तश्री. ब्रह्माश्रम |
विक्रमसम्वत्१४३६ आषाढशुक्ल ९; तुल्य ई. सन् १३८० |
१५ वर्ष. |
|
४६. |
अनन्तश्री. वामनाश्रम |
विक्रमसम्वत् १४५३ चैत्रकृष्ण १३; तुल्य ई. सन् १३९७ |
१७ वर्ष. |
|
४७. |
अनन्तश्री. सर्वज्ञाश्रम |
विक्रमसम्वत् १४८९ चैत्रकृष्ण ८; तुल्य ई. सन् १४३३ |
३६ वर्ष. |
|
४८. |
अनन्तश्री. प्रद्युम्नाश्रम |
विक्रमसम्वत् १४९५; तुल्य ई. सन् १४३९ |
०६ वर्ष. |
|
४९. |
अनन्तश्री. गोविन्दाश्रम |
विक्रमसम्वत् १५२३ ज्येष्ठकृष्ण ४; तुल्य ई. सन् १४६७ |
२८ वर्ष. |
|
५०. |
अनन्तश्री. चिदाश्रम |
विक्रमसम्वत् १५७६ फाल्गुन शुक्ल २; तुल्य ई. सन् १५२० |
५३ वर्ष. |
|
५१. |
अनन्तश्री. विश्वेश्वराश्रम |
विक्रमसम्वत् १६०८ मार्गशीर्षशुक्ल १; तुल्य ई. सन् १५५२ |
३२ वर्ष. |
|
५२. |
अनन्तश्री. दामोदराश्रम |
विक्रमसम्वत् १६१५ चैत्रकृष्ण ५; तुल्य ई. सन् १५५९ |
०७ वर्ष. |
|
५३. |
अनन्तश्री. महादेवाश्रम |
विक्रमसम्वत्१६१६ चैत्रशुक्ल १; तुल्य ई. सन् १५६० |
०१ वर्ष. |
|
५४. |
अनन्तश्री. अनिरुद्धाश्रम |
विक्रमसम्वत् १६२५ माघकृष्ण ४; तुल्य ई. सन् १५६९ |
०९ वर्ष. |
|
५५. |
अनन्तश्री. अच्युताश्रम |
विक्रमसम्वत् १६२९ श्रावणकृष्ण ६; तुल्य ई. सन् १५७३ |
०४ वर्ष. |
|
५६. |
अनन्तश्री. माधवाश्रम |
विक्रमसम्वत् १६६५ माघकृष्ण ४; तुल्य ई. सन् १६०९ |
३६वर्ष. |
|
५७. |
अनन्तश्री. अनन्ताश्रम |
विक्रमसम्वत् १७१६ चैत्रशुक्ल १२; तुल्य ई. सन् १६६० |
५१ वर्ष. |
|
५८. |
अनन्तश्री. विश्वरूपाश्रम |
विक्रमसम्वत् १७२१ श्रावणकृष्ण २; तुल्य ई. सन् १६६५ |
०५ वर्ष. |
|
५९. |
अनन्तश्री. चिद्घानाश्रम |
विक्रमसम्वत् १७२६ माघशुक्ल ६; तुल्य ई. सन् १६७० |
०५ वर्ष. |
|
६०. |
अनन्तश्री. नृसिंहाश्रम |
विक्रमसम्वत् १७३५ वैशाखशुक्ल ४; तुल्य ई. सन् १६७९ |
०९ वर्ष. |
|
६१. |
अनन्तश्री. मनोहराश्रम |
विक्रमसम्वत् १७७१ भाद्रशुक्ल ९; तुल्य ई. सन् १७०५ |
२६ वर्ष. |
|
६२. |
अनन्तश्री. प्रकाशानन्द सरस्वती |
विक्रमसम्वत् १७९५ आश्विनकृष्ण ६; तुल्य ई. सन् १७३९ |
३४वर्ष. |
|
६३. |
अनन्तश्री. विशुद्धानन्दाश्रम |
विक्रमसम्वत् १७९९ वैशाख अमावास्या; तुल्य ई. सन् १७४३ |
०४वर्ष. |
|
६४. |
अनन्तश्री. वामनेन्द्राश्रम |
विक्रमसम्वत् १८३१ श्रावणशुक्ल ६; तुल्य ई. सन् १७७५ |
३२ वर्ष. |
|
६५. |
अनन्तश्री. केशवाश्रम |
विक्रमसम्वत् १८३८ कार्तिककृष्ण ९; तुल्य ई. सन् १७८२ |
०७ वर्ष. |
|
६६. |
अनन्तश्री. मधुसूदनाश्रम |
विक्रमसम्वत् १८४८ माघशुक्ल ५; तुल्य ई. सन् १७९२ |
१० वर्ष. |
|
६७. |
अनन्तश्री. हयग्रीवाश्रम |
विक्रमसम्वत् १८६२; तुल्य ई. सन् १८०६ |
१४ वर्ष. |
|
६८. |
अनन्तश्री. प्रकाशाश्रम |
विक्रमसम्वत् १८६३; तुल्य ई. सन् १८०७ |
०१ वर्ष. |
|
६९. |
अनन्तश्री. हयग्रीवानन्द सरस्वती |
विक्रमसम्वत् १८७४; तुल्य ई. सन् १८१८ |
११ वर्ष. |
|
७०. |
अनन्तश्री. श्रीधराश्रम |
विक्रमसम्वत् १९१४; तुल्य ई. सन् १८५८ |
४० वर्ष. |
|
७१. |
अनन्तश्री. दामोदराश्रम |
विक्रमसम्वत् १९२८; तुल्य ई. सन् १८७२ |
१४ वर्ष. |
|
७२. |
अनन्तश्री. केशवाश्रम |
विक्रमसम्वत् १९३५ आश्विनकृष्ण ७; तुल्य ई. सन् १८७९ |
०७ वर्ष. |
|
७३. |
अनन्तश्री. राजराजेश्वर शङ्कराश्रम |
विक्रमसम्वत् १९५७ आषाढशुक्ल ५; तुल्य ई. सन् १९०१ |
२२ वर्ष. |
|
७४. |
अनन्तश्री. माधवतीर्थ |
विक्रमसम्वत् १९७२ भाद्रपद अमावास्या; तुल्य ई. सन् १९१६ |
१४वर्ष. |
|
७५. |
अनन्तश्री. शान्त्यानन्द सरस्वती |
विक्रमसम्वत् १९८२; तुल्य ई. सन् १९२६ |
१० वर्ष. |
|
७६. |
अनन्तश्री. चन्द्रशेखराश्रम |
विक्रमसम्वत् २००१; तुल्य ई. सन् १९४५ |
१९ वर्ष. |
|
७७. |
अनन्तश्री. अभिनव सच्चिदानन्दतीर्थ |
विक्रमसम्वत् २०३८; तुल्य ई. सन् १९८२ (अभिषिक्त ज्येष्ठशुक्ल १०,विक्रमसम्वत् २००१, २० जून;तुल्य ई. सन् १९५४) |
३७ वर्ष. |
पश्चिमाम्नाय – द्वारकामठ महत्त्वपूर्ण तथ्य

पदासीनकालगणना
ई.सन् पूर्व ४८९ से ई. सन् २०१२ तक
२०१२ + ०४८९ = २५०१ वर्ष

द्वारका शारदापीठके ७४वें श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य श्रीमाधवतीर्थजीके पश्चात् श्रीत्रिविविक्रमतीर्थजी इस पीठके ७५ वें आचार्य हुए। जैसा कि श्रीचतुर्थीलालशर्मा – विरचित ‘आह्निककर्मपद्धति’ के प्रारम्भमें सन्निहित ‘जगद्गुरुशारदापीठाधीश्वर – श्रीमाधवतीर्थाचार्यपादकरकमलसञ्जात त्रिविक्रमतीर्थः’ के अनुशीलनसे सिद्ध है। श्रीत्रिविविक्रमतीर्थजीसे सन् १९१९ में संन्यासदीक्षासम्प्राप्त विश्वविख्यात वैदिकगणितकेरचयिता श्रीभारतीकृष्णतीर्थमहाभाग सन् १९२१ में द्वारका-शारदापीठके ७६ वें श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य हुए।
सन् १९२५ में श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीपीठके १४२वें श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य मधुसूदनतीर्थजीके विशेष अनुरोध और प्रबल आग्रहपर श्रीभारतीकृष्णतीर्थमहाभागने पुरीपीठके आचार्यका दायित्व स्वीकार किया और द्वारका – शारदापीठपर श्रीस्वामी स्वरूपानन्दतीर्थको अभिषिक्त किया। श्रीस्वामी स्वरूपानन्दतीर्थजीके ब्रह्मलीन होनेपर श्रीभारतीकृष्णतीर्थमहाभागने द्वारका – शारदापीठपर विक्रमसम्वत् २००१ तुल्य ई. सन् १९४५ में श्री अभिनवसच्चिदानन्दतीर्थजीको अभिषिक्त किया।
विपक्षके द्वारा श्रीमाधवतीर्थजीके पश्चात् द्वारका – शारदापीठपर श्रीस्वामी शान्त्यानन्दसरस्वती और उनके उपरान्त श्रीस्वामी चन्द्रशेखराश्रम जी मान्यता प्राप्त आचार्य हुए।
— श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर-श्रीमज्जगद्गुरु-शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती
द्वारा लिखित पुस्तक “श्रीशिवावतार-भगवत्पाद-शङ्कराचार्य“
अध्याय “चतुराम्नाय – चतुष्पीठ – परम्परा” पृष्ठ संख्या १०४८ – १०५८

उत्तराम्नाय – ज्योतिर्मठ – गुरुपरम्परा

तोटको१ विजयः२ कृष्णः३ कुमारो४ गरुडः५ शुकः६ ।
विन्ध्यो७ विशालो८ बकुलो९ वामनः१० सुन्दरो११ऽरुणः१२ ।।
श्रीनिवासः१३ सुखानन्दो१४ विद्यानन्दः१५ शिवो१६ गिरिः१७ ।
विद्याधरो१८ गुणानन्दो१९ नारायण२० उमापतिः२१ ।।
एते ज्योतिर्मठाधीशाः आचार्याश्चिरजीविनः ।
य एतान् संस्मरेन्नित्यं योगसिद्धिं स विन्दति ।।
(मन्त्ररहस्य – परिशिष्ट)
श्रीतोटक, विजय, कृष्ण, कुमार, गरुड, शुक, विन्ध्य, विशाल, बकुल, वामन, सुन्दर, अरुण, श्रीनिवास, सुखानन्द, विद्यानन्द, शिव, गिरि, विद्याधर, गुणानन्द, नारायण और उमापति – नामक यति ज्योतिर्मठके आचार्य चिरजीवी हुए हैं। जो इनका नित्य संस्मरण करता है, वह योगसिद्धि लाभ करता है।
युधिष्ठिरसम्वत् २६३१ वैशाखशुक्लपञ्चमीके दिन ई. सन् से ५०७ वर्ष पूर्व भगवत्पाद शङ्कराचार्यका प्रादुर्भाव हुआ। युधिष्ठिरसम्वत् २६५४ वैशाखशुक्लदशमीके दिन ई.सन् से ४८४ वर्ष पूर्व उन्होंने ज्योतिष्पीठपर योगीन्द्र श्रीतोटकाचार्यको प्रतिष्ठित किया। विक्रमसम्वत् १५००; तदनुसार ई. सन् १४४३ में स्वामी श्रीबालकृष्णमहाभाग ज्योतिष्पीठके बाईसवें श्रीमज्जगद्गुरु शङ्कराचार्यपदपर प्रतिष्ठित किये गये। इस प्रकार ई.सन् से ४८४ वर्ष पूर्व + ई.सन् १४४३ = १९२७ वर्षोंमें २१ आचार्योंमें प्रत्येकका कार्यकाल औसतन ९१ वर्ष सिद्ध होता है।
ध्यान रहे; द्वारकापीठके सोलहवें श्रीयोगारूढाचार्यके १०१, पचीसवें श्रीसमाधिरसिकके ७८, तीसरे श्रीसर्वज्ञानाचार्यके ५९. छत्तीसवें श्रीसच्चिदानन्दा श्रमके ५९ वर्ष कार्यकालको देखते हुए ज्योतिष्पीठके २१ आचार्योंके औसतन ९१ वर्ष कार्यकालकी सहिष्णुता योगमाहात्म्यकी दृष्टिसे अर्जित करनी चाहिए।
ई. सन् से ०४८४ वर्ष पूर्व अभिषिक्त श्री. तोटकाचार्यसे ई. सन् २०१२ पर्यन्त ०४८४ योग २०१२ = २४९६ श्रीज्योतिष्पीठकी परम्परा सिद्ध है।
|
क्रम |
योगपट्ट |
|
|
०१. |
अनन्तश्री. तोटक |
युधिष्ठिरसम्वत् २६५४ वैशाखशुक्लदशमी के दिन ई. सन् से ४८४ वर्ष पूर्व अभिषिक्त। |
|
०२. |
अनन्तश्री. विजय |
|
|
०३. |
अनन्तश्री. कृष्ण |
|
|
०४. |
अनन्तश्री. कुमार |
|
|
०५. |
अनन्तश्री. गरुड |
|
|
०६. |
अनन्तश्री. शुक |
|
|
०७. |
अनन्तश्री. विन्ध्य |
|
|
०८. |
अनन्तश्री. विशाल |
|
|
०९. |
अनन्तश्री. बकुल |
|
|
१०. |
अनन्तश्री. वामन |
|
|
११. |
अनन्तश्री. सुन्दर |
|
|
१२. |
अनन्तश्री. अरुणः |
|
|
१३. |
अनन्तश्री. श्रीनिवास |
|
|
१४. |
अनन्तश्री. सुखानन्द |
|
|
१५. |
अनन्तश्री. विद्यानन्द |
|
|
१६. |
अनन्तश्री. शिव |
|
|
१७. |
अनन्तश्री. गिरि |
|
|
१८. |
अनन्तश्री. विद्याधर |
|
|
१९. |
अनन्तश्री. गुणानन्द |
|
|
२०. |
अनन्तश्री. नारायण |
|
|
२१. |
अनन्तश्री. उमापति |
विक्रमसम्वत् १५००; तुल्य ई. सन् १४४३; पर्यन्त १९२७ वर्ष. |
उत्तराम्नाय – ज्योतिर्मठ महत्त्वपूर्ण तथ्य

|
क्रम |
योगपट्ट |
पर्यन्त |
पीठासीन काल लगभग |
|
२२. |
अनन्तश्री. बालकृष्ण |
विक्रमसम्वत् १५०० से १५५७; तुल्य ई.सन् १५०० |
५७ वर्ष. |
|
२३. |
अनन्तश्री. हरिब्रह्म |
विक्रमसम्वत् १५५७ से १५५८; तुल्य ई. सन् १५०१ |
०१ वर्ष. |
|
२४. |
अनन्तश्री. हरिस्मरण |
विक्रमसम्वत् १५५८ से १५६६; तुल्य ई. सन् १५०९ |
०८ वर्ष. |
|
२५. |
अनन्तश्री. वृन्दावन |
विक्रमसम्वत् १५६६ से १५६८; तुल्य ई.सन् १५११ |
०२ वर्ष. |
|
२६. |
अनन्तश्री. अनन्तनारायण |
विक्रमसम्वत् १५६८ से १५६९; तुल्य ई. सन् १५१२ |
०१ वर्ष. |
|
२७. |
अनन्तश्री. भवानन्द |
विक्रमसम्वत् १५६९ से १५८३; तुल्य ई सन् १५२६ |
१४ वर्ष. |
|
२८. |
अनन्तश्री. कृष्णानन्द |
विक्रमसम्वत् १५८३ से १५९३; तुल्य ई. सन् १५३६ |
१० वर्ष. |
|
२९. |
अनन्तश्री. हरिनारायण |
विक्रमसम्वत् १५९३ से १६०१; तुल्य ई. सन् १५४४ |
०८ वर्ष. |
|
३०. |
अनन्तश्री. ब्रह्मानन्द |
विक्रमसम्वत् १६०१ से १६२१; तुल्य ई. सन् १५६४ |
२० वर्ष. |
|
३१. |
अनन्त श्री. देवानन्द |
विक्रमसम्वत् १६२१ से १६३६; तुल्य ई. सन् १५७९ |
१५ वर्ष. |
|
३२. |
अनन्तश्री. रघुनाथ |
विक्रमसम्वत् १६३६से १६६१; तुल्य ई. सन् १६०४ |
२५ वर्ष. |
|
३३. |
अनन्तश्री. पूर्णदेव |
विक्रमसम्वत् १६६१से १६८७; तुल्य ई.सन् १६३० |
२६ वर्ष. |
|
३४. |
अनन्तश्री. कृष्णदेव |
विक्रमसम्वत् १६८७ से १६९६; तुल्य ई. सन् १६३९ |
०९ वर्ष |
|
३५. |
अनन्तश्री. शिवानन्द |
विक्रमसम्वत् १६९६से १७०३; तुल्य ई. सन् १६४६ |
०७ वर्ष. |
|
३६. |
अनन्तश्री. बालकृष्ण |
विक्रमसम्वत् १७०३ से १७१७; तुल्य ई.सन् १६६० |
१४ वर्ष. |
|
३७. |
अनन्तश्री. नारायणोपेन्द्र |
विक्रमसम्वत् १७१७ से १७५०; तुल्य ई. सन् १६९३ |
३३ वर्ष. |
|
३८. |
अनन्तश्री. हरिश्चन्द्र |
विक्रमसम्वत् १७५०से १७६३; तुल्य ई.सन् १७०६ |
१३ वर्ष. |
|
३९. |
अनन्तश्री. सदानन्द |
विक्रमसम्वत् १७६३ से १७७३; तुल्य ई. सन् १७१६ |
१० वर्ष. |
|
४०. |
अनन्तश्री. केशवानन्द |
विक्रमसम्वत् १७७३ से १७८१; तुल्य ई. सन् १७२४ |
०८ वर्ष. |
|
४१. |
अनन्तश्री. नारायणतीर्थ |
विक्रमसम्वत् १७८१ से १८२३; तुल्य ई.सन् १७६६ |
४२.वर्ष. |
|
४२. |
अनन्तश्री. रामकृष्णतीर्थ |
विक्रमसम्वत् १८२३ से १८३३; तुल्य ई. सन् १७७६ |
१० वर्ष. |
|
|
|
|
३३३ वर्ष. |

यह भी प्रसिद्धि है कि टिहरीगढ़वालके नरेश प्रदीपशाहने लोभवश श्रीबदरीनाथजीके अर्चक पदकी नियुक्तिके अधिकारसे ४३वें आचार्य अनन्तश्री. टोकरानन्दजीको वञ्चित कर दिया। नरेशने नम्बूदरीपाद ब्राह्मण ब्रह्मचारी गोपालको रावलकी उपाधि प्रदानकर वि. स. १८३३ में राजवंशके अनुगत अर्चक बना दिया। तबसे नम्बूदरीपाद ब्राह्मणवंशके ब्रह्मचारी राजवंशके अनुगत रहकर अर्थक होने लगे। ज्योतिर्मठके सञ्चालनके लिए अपेक्षित आयका स्रोत श्रीबदरीनाथको श्रद्धालुओंद्वारा समर्पित श्रद्धासुमन ही था। उससे वञ्चित रहनेके कारण ४२वें आचार्य अनन्तश्री. रामकृष्णतीर्थ वि. स.१८२३ से १८३३ तुल्य ई. सन् १७७६के पश्चात् ४३ से ५१ तकके आचार्य ज्योतिर्मठके स्थानापन्न मुख्यालय गुजरातराज्यके अहमदाबाद जनपदमें अवस्थित धोलकामठसे अपने कृत्योंका निर्वाह करते रहे। इनका काल गुजराती वि. स. में समुपलब्ध है; जो कि सामान्यतया वर्षके सात महीनोंतक भारतके उत्तरी भागमें प्रयुक्त विक्रमसम्वत् से ई.स. की अपेक्षा एक सङ्ख्या न्यून होता है।
वेङ्कटेश्वरप्रेससे प्रकाशित आनन्दगिरि, भामती तथा रत्नप्रभासहित ब्रह्मसूत्र – शाङ्करभाष्यके प्रथमभागकी भूमिकाके ४४वें पृष्ठपर ज्योतिर्मठके दो श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्योंका नामोल्लेख इस प्रकार है। –
‘….विष्णुप्रयागतीरनिवासी श्रीमदच्युतानन्दकर – कमलसञ्जाताभिषेक सिंहासनारूढमहाराजाधिराजश्रीज्योतिर्मठाधीश्वरः श्रीमच्छङ्कराचार्यः श्रीराजराजेश्वरानन्दगिरिस्वामिनः श्रीशङ्करोविजयते तराम् ।’
उक्त दोनों आचार्य धोलकामठके सिद्ध हैं। ज्योतिर्मठके पूर्वाचार्योंसे संलग्न धोलकामठके आचार्योंका नामोल्लेख इस प्रकार है।
|
क्रम |
योगपट्ट |
पर्यन्त |
पीठासीन काल लगभग |
|
४३. १. |
अनन्तश्री. टोकरानन्द |
विक्रमसम्वत् १८३३; तुल्य ई. सन् १७७६ |
|
|
४४. २. |
अनन्तश्री. पुरुषोत्तमा नन्द |
|
|
|
४५. ३. |
अनन्तश्री. कैलासानन्द |
|
|
|
४६. ३. |
अनन्तश्री. विश्वेश्वरा नन्द |
|
|
|
४७. ४. |
अनन्तश्री. अच्युतानन्द |
विक्रमसम्वत् १९२९; तुल्य ई. सन् १८७३ |
|
|
४८. ५. |
अनन्तश्री. राज राजेश्वरा नन्द |
विक्रमसम्वत् १९५९; तुल्य ई. सन् १९०३ |
३० वर्ष. |
|
४९. ५. |
अनन्तश्री. मधुसूदना नन्द |
विक्रमसम्वत् १९६७; तुल्य ई. सन् १९११ |
०८ वर्ष. |
|
५०. ६. |
अनन्तश्री. विजयानन्द |
विक्रमसम्वत् १९९५; तुल्य ई. सन् १९३९ |
२८ वर्ष. |
|
५१. ७. |
अनन्तश्री. अद्वैतानन्द |
विक्रमसम्वत् १९९७; तुल्य ई. सन् १९४१ |
०२ वर्ष. |
|
|
|
|
१६५ वर्ष. |
|
क्रम |
योगपट्ट |
पर्यन्त |
पीठासीन काल लगभग |
|
४३ / ५२ |
अनन्तश्री. ब्रह्मानन्द सरस्वती |
चैत्रशुक्लचतुर्थी विक्रमसम्वत् १९९८; १ अप्रिल ई. सन् १९४१ से वैशाखशुक्लदशमी विक्रमसम्वत् २०१० २० मई १९५३ ई. सन् पर्यन्त १२ वर्ष. १९५३ पर्यन्त |
१२ वर्ष. |
|
४४ / ५३ |
अनन्तश्री. कृष्ण बोधाश्रम |
ज्येष्ठशुक्ल त्रयोदशी विक्रमसम्वत् २०१०; ई.स. १९५३ में श्रीकाशी – विश्वनाथके मुक्तिमण्डपमें प्रातः ६ बजे श्रीद्वारका – शारदापीठाधीश्वर अभिनव सच्चिदानन्दतीर्थ एवम् स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराजके सान्निध्यमें अभिषिक्त. भाद्रशुक्ल त्रयोदशी विक्रमसम्वत् २०३०; १० सितम्बर १९७३ ई. सायं ७.३० देहत्याग पर्यन्त. |
२० वर्ष. |
|
४५ / ५४ |
अनन्तश्री. स्वरूपानन्द सरस्वती |
विक्रमसम्वत् ७ दिसम्बर, सन् १९७३ (ग्रन्थरचनावर्ष विक्रमसम्वत् २०६९; तुल्य ई. सन् २०१२ तक) |
३९ वर्ष. |
|
|
|
|
७१ वर्ष. |

अवधि
१९२७ वर्ष + ३३३ वर्ष + १६५ वर्ष + ७१ वर्ष = २४९६ वर्ष.— श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर-श्रीमज्जगद्गुरु-शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती
द्वारा लिखित पुस्तक “श्रीशिवावतार-भगवत्पाद-शङ्कराचार्य“
अध्याय “चतुराम्नाय – चतुष्पीठ – परम्परा” पृष्ठ संख्या १०५९ – १०६५

राजा सुधन्वाकी ताम्रपत्रविज्ञप्ति

श्रीमहाकालनाथाय नमः
श्रीमहाकाल्यै नमः
श्रीमत्सदाशिवापरावतारमूर्त्तिचतुः षष्टिकलाविलास – बिहारमातिबद्धादिस वादिदानव नृसिंहमूर्त्तिवर्णाश्रम दिकसिद्धान्तोद्धार मूर्त्तिमामकीन साम्राज्य व्यवस्थापनमूर्ति विश्वेश्वर विश्वगुरुपद जगज्जेगीयानमूर्त्ति – निखिलयोगचक्रवर्ति श्रीमच्छङ्कर भगवत्पादपद्मयोः भ्रमरायमाण सुधन्वनो मम सोमवंश चूडामणि युधिष्ठिरणारम्प परिप्राप्त भारतवर्ष स्याञ्जलिबन्ध पूर्विकेयं राजन्यस्य विज्ञप्तिः ।
भगवद्भिर्दिग्विजयोऽकारि । सर्वेवादिनः पराकृताः । सर्वे वर्णा आश्रमाश्च कृतयुगवत्पूर्णे वैदिकाध्वनि नियोजिताः सन्तो यथाशास्त्राचरन्ति हि धर्मम्। ब्रह्मविष्णुमहेश्वरमहेश्वरी स्थानान्यशेषदेशवर्तीन्युद्धृतानि । सर्वं ब्रह्मकुलमुद्धारितम्। विशिष्यास्मद्राज्य कुलमान्वीक्षिक्याद्यशेष राजतन्त्रपरिशीलनेनोन्नीतं भवति । ब्रह्मक्षत्राद्यस्मत्प्रमुख निखिलविनेयलोक सम्प्रार्थनया चतस्रो धर्मराजधान्यो जगन्नाथ – बदरी द्वारका शृङ्गुर्षिक्षेत्रेषु भोगवर्द्धन – ज्योति शारदाशृङ्गेरीमठापरसञ्ज्ञकाः संस्थापिताः । तत्रोत्तरा दिशो योगिजनप्राधान्येन धर्ममर्यादारक्षणं सुकरमेवेति ज्योतिर्मठे श्रीतोटकापरनाम्नः प्रतर्दनाचार्यानथ शृङ्गर्ष्याश्रमे शृङ्गर्षिसम स्वभावान्पृथ्वीधराभिधेय हस्तामलकाचार्यान् भोगवर्द्धने स्वत एवाभिमतत्त्वेनात्यन्तोग्रस्व भावानपि सर्वज्ञकल्प पद्मपादापरनाम सनन्दनाचार्यानथ बौद्धकापालिका दिसकलवादिभूयिष्ठ पश्चिमस्यां दिशिवादिदैत्याङ्करः पुनर्मा भवत्विति शारदापीठे किल द्वारकायां जैनैरुत्सादितवज्रनाभ निर्मितभगवदालयादि दुर्दशां दूरीकृत्य भगवद्भिस्त्रिलोक सुन्दरनाम्ना पुनः सन्निबद्धभगवदालय श्रीकृष्णादि- सकलमर्यादा सुसंस्कृतायमधिगताशेषलौकिकवैदिकतन्त्र विश्वविख्यात कीर्तिसर्वज्ञानमयान्विश्वरूपा परनामसुरेश्वराचार्याश्चास्मत्सर्वलोकाभिमति पूर्वकमभिषिच्यैवं चतुर्थ्य आचार्येभ्यश्चतस्रो दिश आदिष्टाः भारतवर्षस्य । त एते तत्तत्पीठप्रणाड्या निज – निजमेव मण्डलं गोपायन्तो वैदिकमार्गमुद्धासयन्तु । सर्वे वयं तत्तन्मण्डलस्था ब्रह्मक्षत्रा- दयस्तत्तन्मण्डलस्यैवाचार्य स्याधिकारिकृता वर्तिष्यामहे च । महद्विनिर्णयप्रसक्तौ तु सुरेश्वराचार्य्या एवोक्तलक्षणतः सर्वत्रैव व्यवस्थापका भवन्तु भगवतामनुशासनाच्च । अस्मद्राजसत्तेव निरङ्कुश गुरुसत्ताप्युक्तमर्यादया जगत्यविचलं विचलतु । परिव्राजको हि महाकुलीनत्ववैदुष्यादि विशिष्टाचार्यलक्षणैरन्वित एव हि श्रीभगवत्पादपीठानामधिकार मर्हति न तु विनिमयेनेत्येवमादि नियमबन्धो भगवदाज्ञासमबुद्धस्समस्तैरथास्मदादि ब्रह्मक्षत्रादि- वंशोद्भवैः परमप्रेम्णोत्तमाङ्गेनाद्रियत इत्येतां विज्ञप्तिमङ्गीकुर्वन्तु भगवन्त इति । स्वस्त्यस्तु लोकेभ्यः ।
युधिष्ठिरशके २६६३, आश्विनशुक्ल १५ ।
– सुधन्वासार्वभौमः

Royal Decree of Sarvbhaum King Sudhanva
ताम्रपत्रविज्ञप्ति
श्रीमहाकालनाथको नमस्कार ।
श्रीमहाकालीको नमस्कार ।
श्रीमत् सदाशिवकी अपरावतारमूर्ति, चौसठ कलाओंके बिलासकी विहारमूर्ति, बौद्धादि समस्त वादिरूप दानवोंके लिए प्रसिंहमूर्ति, वर्णाश्रमयुक्त वैदिक सिद्धान्तकी उद्धारकमूर्ति, मेरे साम्राज्यकी व्यवस्थापकमूर्ति, विश्वेश्वर और जगद्गुरुपदसे जगत् द्वारा गेयमूर्ति, सम्पूर्ण योगियोंके चक्रवर्ती श्रीमत् – शङ्कर भगवत्पादके पादपद्मोंके भ्रमर मुझ राजा सुधन्वाकी जिसे सोमवंशचूडामणि युधिष्ठिरकी परम्परासे भारतवर्षकी राजसत्ता प्राप्त है, करबद्ध भगवत्पादने दिग्विजय कर ली है। सब वादियोंको पराजित कर दिया है। सब वर्ण और आश्रम सत्ययुगके सदृश पूर्णरूपसे वैदिक मार्गपर नियोजित रहते हुए शास्त्रसम्मत धर्मका आचरण करते हैं। श्रीभगवत्पाद सम्पूर्ण देशमें स्थित ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तथा महेश्वरीके अर्चाविग्रहसहित आलयोंका उद्धार कर चुके हैं; तद्वत् सम्पूर्ण ब्राह्मणवंशका भी उद्धार कर चुके हैं। सम्पूर्ण तर्कशास्त्र, धर्मशास्त्र तथा दण्डनीतिके साहचर्यसे सिद्ध राजतन्त्रके परिशीलनसे यह तथ्य सुनिश्चित है कि हमारे राजकुलका भगवत्पादके अमोघ प्रयाससे विशेष उत्कर्ष हुआ है।
ब्राह्मण, क्षत्रियादि हम शिष्यवर्गकी प्रार्थनाको स्वीकार कर श्रीभगवत्पादने जगन्नाथ, बदरी, द्वारका तथा रामेश्वरम् से सम्बद्ध शृङ्ग – ऋषि क्षेत्रको धर्मराजधानी उद्घोषितकर इनमें क्रमशः भोगवर्द्धन, ज्योतिः, शारदा और शृङ्गेरी मठकी स्थापना की। आपने उन चार धामोंमें ‘योगिजनप्रधान उत्तरदिशामें धर्ममर्यादाकी रक्षा सुगमतासे सम्भव है’, ऐसा समझकर ज्योतिर्मठमें श्रीतोटक जिन्हें प्रतर्दनाचार्यके नामसे भी जाना जाता है उन्हें आचार्यपदपर प्रतिष्ठित किया, ऋषि शृङ्गके आश्रममें तदनुकूल स्वभाववाले श्रीहस्तामलकाचार्य जिन्हें पृथ्वीधरके नामसे भी जाना जाता है उन्हें आचार्यपदपर अभिषिक्त किया; पूर्व दिशास्थित भोगवर्द्धनमें स्वतः ही सिद्ध तथा प्रसिद्ध स्वाभिमतसिद्धिमें अभिनिविष्ट अत्यन्त उग्रस्वभावके होते हुए भी सर्वज्ञकल्प श्रीसनन्दनाचार्य जिनकी प्रसिद्धि पद्मपादके नामसे भी है; उन्हें प्रतिष्ठित किया। द्वारका भगवान् श्रीकृष्णके प्रपौत्र वज्रनाभके द्वारा विनिर्मित तथा जैनके द्वारा ध्वस्त मन्दिरकी दुर्दशाको दूर करनेकी भावनासे त्रैलोक्यसुन्दर भगवदालय विनिर्मित कर उसमें श्रीकृष्णादिको निगमागमसम्मत विधिसे सुसंस्कृतकर प्रतिष्ठित किया। तद्वत् बौद्ध कापालिकादि समस्त वादियोंसे परिपूर्ण पश्चिमदिशाका शोधनकर श्रीभगवत्पादने वैदिक समग्र सिद्धान्तकी प्रस्थापना की; उसमें वादिदैत्यरूप अङ्कुर पुनः उज्जीवित न हो जाय, इस भावनासे सम्पूर्ण लौकिक तथा वैदिक – सिद्धान्तमें निष्णात सर्वज्ञमय विश्वविख्यातकीर्ति विश्वरूपाचार्य जिन्हें सुरेश्वराचार्यके नामसे भी जाना जाता है, उन्हें शारदापीठ द्वारका हम अनुगत शिष्योंके सर्वसम्मत अनुरोधपर आचार्यपदपर अभिषिक्त किया।
उक्त रीतिसे श्रीभगवत्पादने भारतवर्षकी चार दिशाओंमें चार आचार्योंको अधिष्ठित किया । उन्हें उन्होंने आदेश दिया कि वे इन पीठोंमें उस – उस पीठकी प्रणालीके अनुसार अपने – अपने ही मण्डलकी रक्षा करते हुए वैदिक मार्गको उद्धासित करें और उस – उस मण्डलसे सम्बद्ध हम सब ब्राह्मण क्षत्रियादि उस – उस मण्डलाधिपति आचार्यकी आज्ञाका पालन करते हुए व्यवहार करें। महत्त्वपूर्ण निर्णयकी स्थितिमें सर्वत्र उक्त लक्षणयुक्त होनेके कारण सुरेश्वराचार्य व्यवस्थापक (निर्णायक) हों; यह श्रीभगवत्पादका अनुशासन है। हमारी राजसत्ताके समान ही निरङ्कुश गुरुसत्ता भी उक्त मर्यादाके अनुसार जगत् में अविचल अनवरत चलती रहे, ऐसी हमारी भावना है।
महाकुलीनत्व तथा वैदुष्यादिविशिष्ट आचार्योचित लक्षणसे समन्वित परिवाजक ही श्रीभगवत्पादद्वारा प्रतिष्ठित पीठके अधिपति होनेमें अधिकृत हैं, नकि किसी प्रकारके विनिमयसे अर्थात् सौदेवाजी या उत्पातसे कोई अन्य।
श्रीभगवत्पादकी आज्ञामें पूर्णरूपसे आस्थान्वित ब्राह्मण क्षत्रियादि वंशमें समुद्भूत हम परमप्रेमपूर्ण सद्भावसम्पन्न हृदयसंज्ञक उत्तमाङ्गसे इस आज्ञाको स्वीकार करते हैं। इस विज्ञप्तिको भगवन्त स्वीकार करें।
सर्व लोकोंका कल्याण हो !
युधिष्ठिरशक २६६३, आश्विनशुक्ल १५.
– सुधन्वासार्वभौमः
— श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर-श्रीमज्जगद्गुरु-शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती
द्वारा लिखित पुस्तक “श्रीशिवावतार-भगवत्पाद-शङ्कराचार्य“
अध्याय “गुरुवंश मठाम्नाय-दिग्दर्शन सेतु-महानुशासनम्” पृष्ठ संख्या ९१३ – ९१७

* साभार: श्री सुमित शर्मा जी (पिलानी) — इस लेख के मूल विचार एवम् मूलपाठ के योगदान के लिए
