सनातन वैदिक ध्वज

‘त्रिकोण रक्तवर्णके वस्त्रपर अङ्कित
श्वेत-वर्णके सूर्यके मध्यमें दक्षिणावर्त स्वस्तिक’
को वैदिक ध्वज माना गया है। —
‘एता देवसेना: सूर्यकेतव: सचेतस:।
अमित्रान् नो जयतु स्वाहा।।’
(अथर्ववेद ५. २१. १२)
‘अरूणै: केतुभि: सह।’
(अथर्ववेद ११. १२. २)
‘स्वस्त्यस्तु विश्वस्य’
(श्रीमद्भागवत ५. १८. ९)
सूर्यमण्डलान्तर्गत सूर्यस्वरूप सर्वरूप अप्रतिरूप शिव
अपनी ध्वजा और पताका पर सूर्यका चिह्न धारण करते हैं। –
‘नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च।
सूर्याय सूर्यमालाय सूर्यध्वजपताकिने॥‘
(महाभारत-शान्तिपर्व २८४.८१)
— श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर-श्रीमज्जगद्गुरु-शंकराचार्य
स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती द्वारा लिखित पुस्तक
“सङ्घे शक्ति: कलौ युगे” पृष्ठ संख्या १८
ध्वजो धूयतां धर्मसङ्घस्य लोके!

जगत्येष विभ्राजते भावुकानाम्,
ध्वजो धर्मसङ्घस्य सद्धार्मिकाणाम् ।
जयी विश्वशास्ता प्रियो मातृभूमेः,
प्रतीको महान् धर्मतन्त्रस्य जातेः ॥ १ ॥
ध्वजो धूयतां धर्मसङ्घस्य लोके !
अयं धर्मगोप्ता सदा धर्मधारी,
तथा सर्वथा विश्वकल्याणकारी ।
अमुष्याधुना मानरक्षाविधेया,
समागम्य सर्वैः स्वयं भो विधेयाः ॥ २ ॥
ध्वजो धूयतां धर्मसङ्घस्य लोके !
अयं विस्फुरन् कुङ्कुमाभस्त्रिकोणो
लसद् बालसूर्यच्छविः स्वस्तिवर्चाः ।
समर्चामुपेतः स्वशौर्यादिभावैर्-
ध्वजो वन्द्यते भुक्तिमुक्ति प्रदो नः ॥ ३ ॥
ध्वजो धूयतां धर्मसङ्घस्य लोके !
शुभो हिन्दुराष्ट्रस्य जागर्तिकारी,
सदा स्वस्तिकेनाङ्कितो भीतिहारी ।
तथाऽऽलस्यपाखण्डविध्वंसकारी,
भवेदास्तिकानां सदैवाग्रचारी ॥ ४ ॥
ध्वजो धूयतां धर्मसङ्घस्य लोके !
अमुष्मिन् प्रशस्तिः परा पूर्वजानाम्,
महाशक्तिरेषोऽधुना सङ्गतानाम् ।
तथा भाविराष्ट्रस्य सन्मार्ग-दर्शी,
ध्वजो धूयतां धार्मिकोऽभीष्टवर्शी ॥ ५ ॥
ध्वजो धूयतां धर्मसङ्घस्य लोके !

लोकमें धर्मसङ्घका ध्वज फहराये !
सन्मार्गगामी धार्मिक भावुकोंके धर्मसङ्घका यह ध्वज जगत् में सुशोभित है।
यह धर्मतन्त्रका द्योतक तथा विश्वविजयी शासनतन्त्रका महान् प्रिय प्रतीक है ॥ १ ॥
यह सदा ही धर्मरक्षक और धर्मधारक है तथा सर्वथा विश्वकल्याणकारी है।
इस समय भारतीयों और अन्य सबोंके द्वारा समवेत होकर इस मानबिन्दुकी रक्षा विहित है ॥ २ ॥
केसरिया त्रिकोण ध्वजके बालसूर्यकी छविसे और तद्गत समुज्ज्वल स्वस्तिक चिह्नसे सुशोभित फहराता हुआ यह ध्वज है।
स्वानुकूल शौर्यादि भावोंसे इसकी समर्चा अपेक्षित है। यह हमारे लिये भुक्ति (भोग) तथा मुक्ति (मोक्ष)-प्रद है ॥ ३ ॥
यह स्वस्तिक चिह्नसे समुज्ज्वल तथा सदा हिन्दुराष्ट्रका उद्दीपक है। यह सज्जनोंको प्रेरणादायक और भयापहारक है।
तद्वत् आलस्य और पाखण्डका विध्वंसक तथा आस्तिकोंका सदा ही अग्रगामी है ॥ ४ ॥
इसमें पूर्वजोंकी परा प्रशस्ति सन्निहित है।
इस समय यह सङ्गत सज्जनोंकी महाशक्ति है तथा भाविराष्ट्रका सन्मार्गदर्शी है।
धार्मिकोंके लिये अभीष्टकी वर्षा करनेवाला यह ध्वज फहराता रहे ॥ ५ ॥
हे राष्ट्रध्वज वन्दन तेरा

हे राष्ट्रध्वज तेरा वन्दन।
हे वन्दनीय तेरा वन्दन।।
हे माननीय तेरा नन्दन।
हे मानबिन्दु तेरा रक्षण।।
हे शौर्यप्रदर्शक शक्तिस्वरूप।
हे मानरक्षक क्रान्तिरूप।।
हे सूर्य चन्द्र अरु अग्निरूप।
हे विद्युल्लेखा चक्ररूप।।
है त्रिकोणमध्य बालसूर्य।
तन्मध्यगत स्वस्तिक अपूर्व।।
केसरिया वस्त्र त्यागरूप।
वैदिकध्वज वैभवस्वरूप।।
हे श्रुति-स्मृति-पुराणस्वरूप।
हे युगप्रवर्तक रामरूप।।
हे दुर्गा – काली – सतीरूप।
सीता – सावित्री – शचीरूप।।
हे ब्रह्मा – विष्णु – महेशरूप।
हे आदित्य और गणेशरूप।।
हे शक्तिरूप सृष्टिस्वरूप।
हे सर्वेश्वर सच्चित्स्वरूप।।
हो आर्यधर्म – निर्वाहक तुम।
वैदिकताके वाहक तुम।।
हो हिन्दुधर्मके पालक तुम।
सत्यशील – उद्धारक तुम।।

“सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु।”
(महाभारत – शान्तिपर्व ३२७. ४८)
“सब सङ्कटसे पार (दुर्गतिसे दूर) हों, सब सर्वविध कल्याणको प्राप्त हों।”
— श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर-श्रीमज्जगद्गुरु-शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती द्वारा लिखित पुस्तक “सनातनधर्म-प्रश्नोत्तर-मालिका” पृष्ठ संख्या ३७०” और सङ्घे शक्ति: कलौ युगे” पृष्ठ संख्या १९-२०
