शंकराचार्य – सनातन धर्म के सार्वभौम धर्मगुरु

श्री हरि:
श्रीगणेशाय नमः

नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते

जय गणेश
श्रियं सरस्वतीं गौरीं गणेशं स्कन्दमीश्वरम्।
ब्रह्माणं वह्निमिन्द्रादीन् वासुदेवं नमाम्यहम्॥

"लक्ष्मी, सरस्वती, गौरी, गणेश, कार्तिकेय,
शिव, ब्रह्मा एवम् इन्द्रादि देवोंको तथा
वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ।।"


शंकराचार्य - सनातन धर्म के सार्वभौम धर्मगुरु
शंकराचार्य – सनातन धर्म के सार्वभौम धर्मगुरु

षण्मत स्थापकाचार्य


जब कहा जाता है कि शङ्कराचार्य जगद्गुरु होते हैं, शङ्कराचार्य वैष्णव परम्पराकी उस समयसे रक्षा करते चले आ रहे हैं जिस समय वैष्णव आचार्य अवतरित नहीं हुए थे, तो कई लोगोंको लगता है कि यह सब केवल कहनेकी बातें हैं। कई दुर्जन तो इस प्रकार भी प्रचार करते हैं कि शङ्कर परम्परा वैष्णव परम्पराओंको फलने-फूलने से रोकने में कई सदियों तक संलग्न रही और आज जब वैष्णव परम्पराओंके कारण हिन्दू धर्म पुष्ट हो रहा है तब वह उनके संरक्षणका श्रेय लेने पर उतर आई है। तो देखें श्री वल्लभाचार्यकी वंश-परम्परामें १७वीं पीढ़ीकी वंशज विदुषी मैत्रेयी गोस्वामीजी स्वयं इस बारेमें क्या कह रही हैं।

षण्मत स्थापकाचार्यका मतलब है कि वैदिक, तांत्रिक, पौराणिक और स्मार्थ चारों परम्पराओंमें जितनी भी कर्म दीक्षा होती है, ज्ञान दीक्षा होती है और उपासन दीक्षा होती है — सब देते हैं। जिसे जो करना है सनातनी होकर तुम्हें जो करना है वह करो, क्योंकि बहुतसे मार्ग उनकी परम्पराएँ उनके गुरु यह सब लुप्त हो गए हैं; जैसे कश्मीर शैव परम्पराका अब कुछ नहीं बचा है, कुछ भी नहीं बचा है। लिखित ग्रन्थोंके अतिरिक्त ना कोई गुरु, ना कोई साधक उपलब्ध होता है, ना कोई साधना सिखाने वाला होता है; तो किसी भी शङ्कराचार्यके पास जाकर यदि वह यह कहें कि हमें कश्मीर शैव परम्परा की दीक्षा चाहिए, तो वो उस मन्त्र का दान करते हैं।
विलुप्त परम्परा
शङ्कराचार्यका वो स्टैंडर्ड है कि वो वेद संबंधी जितने भी मार्ग हैं उन सबके आचार्यत्वका कॉमन निर्वाह करते हैं। उन्हें अधिकार है ये करनेका। वो शङ्कराचार्यजी खुद अपनी परम्परासे प्रमाण है, आदि शङ्कराचार्य अपनी परम्परासे प्रमाण है। किसीको गोपाल मन्त्र चाहिए हो, पुष्टि मार्गी न बनकर, उसे भी देते हैं। ऐसे बहुत पूर्वाचार्योंके उदाहरण है ही जिन्होंने दिए हैं, खुद दीक्षित होते हैं तो देते हैं। वल्लभ सम्प्रदायमें लाने के लिए नहीं, तन्त्रोक्त दीक्षाका अधिकार देनेके लिए। गोपाल मन्त्रकी अपने जो खुद दीक्षित होता है वही वो दे सकता है; तो यहां बालकोंको जब गायत्री दीक्षा देते हैं तो किस अधिकारसे देते तो हैं, दीक्षा ही दी जा रही है ना। वह तो गायत्री दीक्षा दे रहे हैं तो किस अधिकारसे दे रहे हैं? ऐसे गोपाल मन्त्रकी दीक्षा भी कोई व्यक्ति पुष्टि मार्गी नहीं हो और स्वतन्त्र तन्त्रोक्त पूजा कृष्णकी करना चाहता हो, शालिग्राम उपासना करना चाहता हो तो गोपाल मन्त्रकी दीक्षा क्यों नहीं दे सकते हैं? दे ही सकते हैं, खुद दीक्षित हो दे सकते हैं।
षण्मत स्थापकाचार्य
उस अधिकारसे शङ्कराचार्यजी ने जब बौद्धमतके प्रचलनके बाद अपनी सब परम्पराओंको रिवाइव किया तो केवल ज्ञान परम्पराको नहीं रिवाइव किया है, हर परम्पराको रिवाइव किया है। इसलिए उस परम्परा प्राप्त अधिकारसे वह लोग जो व्यक्ति जिस मार्गका अनुसरण करना चाहता है, उसे उस मार्गकी तरफ शास्त्रके बताए हुए प्रक्रियासे देते हैं कि तुम यह कर लो और उस मन्त्रका शास्त्रमें लिखित उस मन्त्रका उन्हें दान देकर उसकी दीक्षा दे देते हैं।
षण्मत स्थापकाचार्य
विष्णु मन्त्रोपदेश यदि करना हो तो तंत्रोक्त मन्त्रका उपदेश देना आचार्य होनेके नाते परम्परासे उनके वहां अधिकार मान्य है, मतलब ये सिद्धि वो शास्त्र प्रमाणसे नहीं परम्परा प्रमाणसे देंगे; यह अधिकार आदि शङ्कराचार्यकी परम्परा प्रमाणसे है। इसीलिए उन्हें षण्मत स्थापकाचार्य कहा जाता है और उसी बल पर आदि शङ्कराचार्यको जगद्गुरुकी उपाधि दी गई थी जो सबके लिए ईर्ष्याका विषय बन गया। जगद्गुरुका मतलब यह था कि सनातन परम्पराकी हर परम्पराके गुरु। क्योंकि वह सब खो चुकी थी। समस्या यह थी कि किसी को करना है मानो कश्मीर शैव परम्पराका अनुसरण करना है, वह मार्ग ही नहीं बचा। स्वयं सब कुछ पढ़ सकते हो पर कोई उसका उपयोग बताने वाला तो कोई चाहिए, क्योंकि शास्त्रका आचयन करनेकी मेरी तो योग्यता नहीं है कि अभिनवगुप्तको या इन सबको पढ़कर मुझे सब कुछ समझमें आ जाए। तो वो मुझे बता देंगे कि हां ऐसा ऐसा है, इस तरहसे समझ लो, ऐसा कर लो; शंका है तो उनसे जाकर पूछ लो, ऐसे करते हैं।


— अगर शङ्कर परम्परा ना होती तो जगतके कई सम्प्रदाय गुरु ना मिलनेके कारण लुप्त हो चुके होते

क्या शङ्कराचार्य दूसरे संप्रदाय के आचार्यों को सुनने से रोकते हैं?


इसी प्रकार आह्वान चैनलके शिवांश दूबे जी ने भी अपना एक अनुभव दासबोध चर्चा सत्र “क्या शङ्कराचार्य भी दूसरे सम्प्रदायके आचार्यों को सुननेसे रोकते हैं? Daasbodh Lectures” नामक एक विडीओमें साँझा किया।

शङ्कराचार्य दासबोध पढ़नेको दे रहे हैं और दासबोध कह रहा है कि इसमें भक्तिमार्गके द्वारा मुक्ति बताई गई है। क्या इसकॉन वाले कभी कहते हैं हिन्दी दासबोध पढ़ो जाकर के? नहीं कहते। क्या इसकॉन वाले कभी कहते हैं कि ज्ञानेश्वरी गीता पढ़ो? जो उनके सम्प्रदायसे सम्बद्ध ग्रन्थ नहीं है, उनको पढ़नेके लिए कभी इसकॉन वाले कहते हैं?
पुराण दिग्दर्शन
मैं पहली बार जब शङ्कराचार्य भगवानके दर्शन करने गया था, उनके दर्शन मुझे सुलभ हुए थे, तो उन्होंने जब मैंने अपनी शंका उनको व्यक्त की थी तो उन्होंने मुझको शङ्कर परम्परा का ग्रन्थ पढ़ने के लिए नहीं कहा था। उन्होंने मुझे कहा था कि रामानुज सम्प्रदायके महान शास्त्रार्थके मर्मज्ञ महान शास्त्रार्थी पंडित माधवाचार्य शास्त्रीजीका ग्रन्थ “क्यों और पुराण दिग्दर्शन” आप ले लीजिए और उसका अध्ययन करिए। उनको सत्यकी रक्षा करनी थी, सत्यकी चिंता थी, सत्य बोलना था — भले ही रामानुजाचार्यजीका ग्रन्थ पढ़ने को कहना पड़े। रामानुज परम्पराका ग्रन्थ पढ़ने को कहना पड़े तो पड़े, पर उनको सत्य बोलना था, सत्यनिष्ठ हैं।


— क्या शङ्कराचार्य भी दूसरे संप्रदाय के आचार्यों को सुनने से रोकते हैं?

शङ्कराचार्य और वैष्णवाचार्य: विवाद नहीं, सामञ्जस्य


पुरी शङ्कराचार्यजी अन्य सम्प्रदायोंका कितना सम्मान करते हैं यह स्वयं उनकी ही वाणीसे सुन लें (पढ़ लें): –

श्रीमध्वाचार्यजी आखिर भगवानको मानते हैं और भगवानसे ही सृष्टिकी उत्पत्तिको भी स्वीकार करते हैं, भले ही जीव और ईश्वरमें भेद मानते हैं लेकिन वे ८०% भगवान श्री आदिशङ्कराचार्य महाभागका जो सिद्धान्त है, उसके सन्निकट हैं।

क्यों हैं? बल्कि और भी कह सकते हैं; कर्मकाण्ड परक ८०% श्रुतियाँ हैं, उनको लेकर इन आचार्योंमें कोई भेद नहीं है, मतभेद नहीं है। उपासना काण्ड परक १६% श्रुतियाँ हैं उनको लेकर भी इन वैष्णवाचार्योंके साथ श्री आदिशङ्कराचार्यजीका कोई भेद मतभेद नहीं है। इसका अर्थ हुआ कि एक प्रकार से ९६% सामंजस्य श्रीशङ्कराचार्यजी और श्रीमध्वाचार्यजीके सिद्धान्तका हो जाता है।
शङ्कराचार्य और वैष्णवाचार्य: विवाद नहीं, सामञ्जस्य
कल मैंने एक प्रश्नके उत्तरमें कहा था कि ९३वें अध्यायके अंतिम श्लोककी व्याख्यामें तो कट्टर द्वैतवादी श्रीमध्वाचार्यजीने उसी तथ्यको अपना लिया, जिस तथ्यको भगवान श्रीशङ्कराचार्यजीने पहले से ही उद्भाषित किया था। विशिष्टाद्वैतको मानते हैं श्रीरामानुजाचार्य महाभागको तो एक प्रतिशत भगवान श्रीशङ्कराचार्यके सन्निकट और पहुंच जाते हैं, ९७%; और अगर हम श्रीनिम्बकाचार्यजीके पक्षको स्वीकार करते हैं तो एक प्रतिशत और श्रीशङ्कराचार्यके सन्निकट पहुंच जाते हैं, ९८%श्रीवल्लभाचार्यजीके सिद्धान्तको स्वीकार करते हैं तो एक प्रतिशत भगवान श्रीशङ्कराचार्यके नजदीक और पहुंच जाते हैं।
श्रीशङ्कराचार्यसे सामञ्जस्य
९९%, ९८%, ९७%, ९६% तालमेल है, इसको लेकर। ९९% श्रीवल्लभाचार्यजी, फिर ९८% श्रीनिम्बकाचार्यजी, ९७% श्रीरामानुजाचार्यजी, ९६% श्रीमध्वाचार्यजी — इन आचार्योंसे हमारा इतना प्रतिशत तालमेल है, सामञ्जस्य है। तो चार प्रतिशत या एक प्रतिशतको लेकर विवादकी तो बात ही नहीं है, वो भी सत्य सत्ताकी क्रमिक अभिव्यक्तिकी भावनासे प्रतिशतकी बात है।

— शङ्कराचार्य और वैष्णवाचार्य: विवाद नहीं, सामञ्जस्य

श्रीशङ्कराचार्य ही सार्वभौम धर्मगुरु क्यों


श्रीरामानुजाचार्य, श्रीरामानन्दाचार्य, श्रीनिम्बकाचार्य, श्रीविष्णुस्वामी आचार्य, श्रीवल्लभाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीचैतन्य महाप्रभु इत्यादि जितने आचार्य हुए हैं, इन सभी सम्प्रदायोंको अगर आप देखेंगे तो ये एक मन्त्र विशेषको लेकरके सम्प्रदाय परम्परा है। बहुत ध्यानसे श्रवण करना। प्रायः हिंदुओंके मनमें यह जिज्ञासा होती है कि बहुतसे सम्प्रदाय हैं, ऐसे शाङ्कर सम्प्रदाय भी हैं, फिर श्रीशङ्कराचार्य ही सार्वभौम धर्मगुरु क्यों हैं?
सार्वभौम धर्मगुरु जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्य
श्रीरामानुजाचार्यने कोई रामानुजाचार्यकी पीठ नहीं बनाई, कोई पद नहीं बनाया। आज जो श्रीरामानुजाचार्य इत्यादि जो भी वैष्णवाचार्य (किसी पर आक्षेपमें हमारा तात्पर्य नहीं है, किंतु यह तथ्य है कि) श्रीरामानुजाचार्यजीने कोई रामानुजाचार्य परम्परा नहीं बनाई, कोई पद नहीं चलाया। ना श्रीरामानंदाचार्यजीने किसी को रामानंदाचार्य बनाया, ना श्रीनिम्बकाचार्यजीने किसी को निम्बकाचार्य बनाया, ना श्रीवल्लभाचार्यजीने उनके नौ पुत्रों में से जो ज्येष्ठ श्रेष्ठ थे – श्रीगोस्वामी विट्ठलनाथजी, उनको उन्होंने वल्लभाचार्य नहीं कहा। श्रीमध्वाचार्यने अपने किसी शिष्यको मध्वाचार्य नहीं बनाया। बादमें श्रीशङ्कराचार्यका अनुगमन करनेके स्थान पर कल्पित ढंगसे यह सब पद आज भारतमें चल रहे हैं। इन सभी आचार्योंने सार्वभौम धर्मगुरु श्रीशङ्कराचार्यको माना है। ये सब आचार्य श्रीशङ्कराचार्यके बाद हुए और उस समय चारों पीठके मान्य शङ्कराचार्योंको ही इन आचार्योंने सार्वभौम धर्मगुरु, जगद्गुरु माना।
चारों युगोंके जगद्गुरु
भगवान शङ्करने तो घोषणाकी है (आप पुराणोंको उठाकर पढ़े स्मृतियोंको उठाकर पढ़े) सतयुगमें भगवान ब्रह्मा ही जगद्गुरु हैं, और त्रेतामें द्वितीय ब्रह्मा, ब्रह्माजीके समान ही सामर्थ्यको धारण करने वाले, ब्रह्मपुत्र वशिष्ठजी जगद्गुरु हैं – त्रेतायुगमें। द्वापरमें कृष्णद्वैपायन भगवान व्यासजी जगद्गुरु हैं और कलियुगमें भगवान शङ्करने (शिव पुराणका परिशिष्ट वायु पुराण वहां पढ़े वहां भगवान शिवने) घोषणाकी है कि कलियुगमें मैं ही जगद्गुरु हूँ। मुण्डित रूपमें एक दण्ड धारण किया हुआ। यजुर्वेद कहता है “नमः कपर्दिने च व्युप्त केशाय च”जटाजूटवाले शङ्करजीका वर्णन है – नमः कपर्दिन व्युप्त केशाय च – मुण्डित सिर वाले शङ्करको वेद प्रणाम कर रहा है। विप्त केशाय च मुण्डित सिर वाले शङ्कर कहाँ है, भाई?
श्रीशङ्कराचार्य ही सार्वभौम धर्मगुरु
तो भविष्य पुराणमें घोषणाकी कि मुण्डित सिर वाले शङ्कर शङ्कराचार्य हैं जो कलियुगके आरंभमें वैदिक सनातनधर्मको; जब चारों धाम लुप्त हो जाते हैं कलियुग में, १२ ज्योतिर्लिंग५२ शक्ति पीठें, चारों कुम्भकी मर्यादाएं लुप्त हो जाती है, वर्णाश्रम व्यवस्था लुप्त हो जाती है, शून्यवाद, निरीश्वरवाद, नयात्मवाद छा जाता है, वेद विरोधी जब अनाच्छादित हो जाते हैं – उस समय सनातनधर्मकी पुनः स्थापनाके लिए भगवान शङ्कर ही शङ्करम शङ्कराचार्यम शङ्कराचार्य के रूपमें प्रकट होते हैं। मेरी पीठके जो चार शङ्कराचार्य – मेरे द्वारा प्रतिष्ठापित मेरे शिष्य शङ्कराचार्य होंगे वो साक्षात मेरा ही स्वरूप माने जाएंगे। भगवान शङ्कराचार्य कह रहे हैं। अस्तु, मेरा स्वरूप माने जाने के कारण चार पीठ के शङ्कराचार्य (कलियुगके अंतिम चरण तक यह परम्परा चलेगी) यही चारों जगद्गुरु होंगे।
भविष्य पुराणमें घोषणा
ये भगवान शिवकी घोषणा है। अन्य जो सम्प्रदायोंकी परम्परा है उसी प्रकार शाङ्कर सम्प्रदायकी परम्परा है ऐसा नहीं समझना चाहिए। जितने भी आचार्य हैं (आप ध्यानसे सूक्ष्म दृष्टिसे देखें, ध्यानसे श्रवण करें) किसी ना किसी भगवानके एक स्वरूप विशेषको लेकर के वो सम्प्रदाय है। श्री सम्प्रदायमें युगल स्वरूप की आराधना है, श्री पुष्टि मार्गमें विष्णु स्वामी वल्लभाचार्यजीके यहां बालक भगवान बालरूपमें जो कृष्ण है उनकी आराधना है, श्री रामानन्द सम्प्रदायमें श्रीसीतारामजीकी आराधना है, श्री रामानुज सम्प्रदायमें रंग लक्ष्मी – गोदा रंग लक्ष्मी – विष्णु लक्ष्मीकी आराधना है, श्री चैतन्य महाप्रभुजीके यहां श्री युगल सरकार राधा कृष्णकी आराधना है।
शाङ्कर सम्प्रदायकी परम्परा षण्मत

— श्रीशङ्कराचार्य ही सार्वभौम धर्मगुरु क्यों

एक गुरु !


कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायां ऋषिसत्तम।
द्वापरे व्यास एव स्यात् कलावत्र भवाम्यहम्।।

(श्रीमठाम्नायसेतु – महानुशासनम् ७७)

सत्ययुगमें स्वयं ब्रह्मा, त्रेतामें वसिष्ठ, द्वापरमें व्यासदेव विश्वगुरु थे। इस कलियुगमें मैं शङ्कराचार्य जगद्गुरु हूँ।।”

ब्रह्मा कृतयुगे पूज्यस्त्रेतायां यज्ञ उच्यते।
द्वापरे पूज्यते विष्णुरहं पूज्यश्चतुष्र्व्वपि।।

(वायुपुराण २. ३२. २१)

सत्ययुगमें ब्रह्मा पूज्य हैं, त्रेतामें यज्ञ अर्थात् यज्ञप्रवर्तक वसिष्ठ पूज्य हैं, द्वापरमें विष्णुके कलावतार व्यास पूज्य हैं। चारों युगोंमें पूज्य मैं महेश्वर कलियुगमें विशेषरूपसे पूज्य हूँ।।”
चारों युगों के जगद्गुरु
कृते तु भगवान् सत्यस्त्रेतायां दत्त एव च।
द्वापरे भगवान् व्यासः कलौ श्रीशङ्करः स्वयम्।।


आद्ये सत्त्वमुनिः सतां वितरति ज्ञानं द्वितीये युगे
दत्तो द्वापरनामके तु सुमतिर्व्यासः कलौ शङ्करः।

इत्येवं स्फुटमीरितोऽस्य महिमा शैवे पुराणे यत-
स्तस्य त्वं सुमते मते त्ववतरेः संसारवार्धि तरेः ।।

(शङ्करदिग्विजय ९. २२)

शिवपुराणके अनुसार सत्ययुगमें भगवान् सत्य (ब्रह्मा / दक्षिणामूर्ति / कपिल), त्रेतामें दत्तात्रेय, द्वापर में भगवान् व्यास और कलिमें स्वयम् शङ्कर विश्वगुरु मान्य हैं।

— श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर-श्रीमज्जगद्गुरु-शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्दसरस्वती द्वारा लिखित पुस्तक “गर्व से कहें – ‘हम हिन्दू हैं'” अध्याय “एकत्वदर्शन” पृष्ठ संख्या ९०

हिन्दुओं का सार्वभौम धर्म गुरु


अंग्रेजोंके शासनकाल तक भारतको सार्वभौम धर्मगुरुकी पहचान थी। आज कोई भारतका सार्वभौम धर्मगुरु नहीं है। अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना रागक्रिश्चनोंके पास सार्वभौम धर्मगुरुके रूपमें, मजहब-पन्थ गुरुके रूपमें पोपजीका नाम लिया जाता है। आज बौद्धोंके यहाँ सार्वभौम धर्मगुरुके रूपमें, गुरुके रूपमें, मजहब-गुरुके रूपमें दलाई लामाका नाम लिया जाता है। भारतवासियोंसे हम पूछना चाहते हैं, आपका सार्वभौम धर्मगुरु कौन है?

हिन्दुओं का सार्वभौम धर्म गुरु
जगत् गुरुको छोड़ बहुनायकवाद जो है, एकके अंतर्गत काम ना करनेकी भावना है। अपने अनुयायियोंका उपयोग अपने तुच्छ व्यक्तित्वके पोषणके लिए करनेकी भावना है। यह हमारे लिए सबसे अधिक पतनकी बात है। इसलिए जब अंग्रेजोके शासनकालमें भी हमारे कोई सार्वभौम धर्मगुरु थे, तो स्वतंत्र भारतमें क्या विकृति आ गई? आज हिन्दुओंका कोई भी बता सकता है कि हिन्दुओंके सार्वभौम धर्मगुरु कौन है? नहीं कह सकता। आपको कहना पड़ेगा – भाजपाके स्वरमें, कांग्रेसके स्वरमें, बसपाके स्वरमें, सपाके स्वरमें – दलाई लामाहिन्दुओंके धर्मगुरु दलाई लामा है। दलाई लामा स्वयं कहते हैं – मैं हिन्दू नहीं।
हिन्दुओं का सार्वभौम धर्म गुरु
और विश्वगुरु कौन है जिनका शरीर छूटने पर तीन दिनों तक भारतका राष्ट्रध्वज झुका रहा – पोप महोदय। भारतकी धरतीसे, सनातन वैदिकधर्मसे अपनत्व रखने वाले भारतमें सार्वभौम धर्मगुरुका विलोप है – इधर ध्यान देना चाहिए। कहीं हमारा बहुनायकवाद ही हमारे पतनका कारण ना हो जाए; इस पर गंभीरतासे विचार करना चाहिए। हर हर महादेव!
— श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती महाराजका वक्तव्य;

सनातन धर्म परम्पराके सुरक्षा स्तम्भ


हमारे आचार्य सनातन धर्म परम्पराके सुरक्षा स्तम्भ हैं। उनके कारण हमारी परम्पराओंकी अक्षुण्णतामें जिस प्रकारकी पवित्रता स्थापित है, वह तो महायन्त्रों द्वारा संचालित प्रसार तन्त्रोंके युगमें भी सम्भव नहीं है।
एकताका जीवन्त प्रमाण
ऋग्वेदकी शाकल शाखाके उदाहरण दे रहे हैं। बहुत सी शाखाओंमें से ऋग्वेदकी एक शाकल शाखाका कोई पण्डित है वह रहता है कश्मीरमें और एक ब्राह्मण रहता है दक्षिण भारतमें; भले ही लोक व्यवहारके लिए कश्मीरी व्यक्ति डोगरी भाषा बोलेगा और वहां रामेश्वरममें रहने वाला तमिल भाषा बोलेगा। उसका पहनावा ओढ़ावामें थोड़ा अन्तर हो सकता है, थोड़े कर्मकाण्डकी विधामें अन्तर हो सकता है वो भी शाखा भेदसे अपनी-अपनी। लेकिन वेदमन्त्रका उच्चारण, कितने समय तक उसका उच्चारण करना है, उसकी पाण्डुलिपि वो हजारों वर्ष पहले हिमालयकी चोटीमें, कश्मीरमें जैसा है – वैसाका वैसा एक शब्द, एक वाक्य, एक अक्षर, एक मात्राका भी भेद नहींवैसाका वैसा हजारों किलोमीटर दूर रामेश्वरममें है।



— सनातन धर्म परम्पराके सुरक्षा स्तम्भ
सनातन धर्मके स्तम्भ: जगद्गुरु आदिशङ्कराचार्य
सनातन धर्मके स्तम्भ: जगद्गुरु आदिशङ्कराचार्य


* साभार: श्री सुमित शर्मा जी (पिलानी) — इस लेख के मूल विचार के योगदान के लिए



मित्रैः सह साझां कुर्वन्तु