हिन्दूराष्ट्र की अर्थनीति

श्री हरि:
श्रीगणेशाय नमः

नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते

जय गणेश
श्रियं सरस्वतीं गौरीं गणेशं स्कन्दमीश्वरम्।
ब्रह्माणं वह्निमिन्द्रादीन् वासुदेवं नमाम्यहम्॥

"लक्ष्मी, सरस्वती, गौरी, गणेश, कार्तिकेय,
शिव, ब्रह्मा एवम् इन्द्रादि देवोंको तथा
वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ।।"


आर्थिक सन्तुलन का वैदिक मार्ग: हिन्दूराष्ट्रकी अर्थनीति
आर्थिक सन्तुलन का वैदिक मार्ग: हिन्दूराष्ट्रकी अर्थनीति

व्यक्तिगत सम्पत्ति


भारतीय धार्मिक, राजनीतिक शास्त्रोंने व्यक्तिगत सम्पत्तियोंको वैध माना है। मन्वादि धर्मशास्त्र, मिताक्षरा आदि निबन्धग्रन्थमें कहा गया है कि पितृपितामहादिकी सम्पत्तियोंमें पुत्रपौत्रादिका जन्मना स्वत्व है। गर्भस्थ शिशुका भी पिता-पितामहादिकी सम्पत्तिमें स्वत्व मान्य है। अतएव दायके रूपमें प्राप्त चल, अचल धन पुत्रादिका वैध धन है। इसी प्रकार निधि लाभ, मित्रोंसे मिली, विजयसे प्राप्त, गाढ़े पसीनेकी कमाईसे खरीदी हुई सम्पत्ति, पुरस्कार तथा दानमें प्राप्त एवं उद्योग, कृषि, व्यापारादि तथा उचित सूद आदिद्वारा प्राप्त सम्पत्ति वैध-सम्पत्ति समझी जाती है—
व्यक्तिगत सम्पत्तियोंकी वैधता
सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभ: क्रयो जय:।
प्रयोग: कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च॥

(मनु०, १०.११५)

प्राय: आज भी सभी देशोंमें सम्पत्ति-सम्बन्धी नियम ऐसे ही हैं। किसीकी व्यक्तिगत सम्पत्ति, भूमि, मकान आदिपर उनके उत्तराधिकारियोंका अधिकार रहता है, सरकार भी अगर किसीकी कोई वस्तु सार्वजनिक हितकी दृष्टिसे लेती है तो उसे मुआविजा देती है। भारतमें भी जमींदारी, जागीरदारीका मुआविजा दिया गया है; राजाओंसे राज्य लेकर उन्हें कुछ सालाना दिया जा रहा है। इससे सिद्धान्तत: भारत-सरकारने बाप-दादाकी सम्पत्तिको बेटे-पोतेकी बपौती-मिलकियत होनेका सिद्धान्त मान लिया, तभी मुआविजा और सालाना देनेकी बातकी संगति लगती है, अन्यथा मुआविजा आदि देनेकी कोई संगति नहीं लग सकती। हाँ, यह बात अवश्य है कि जब राज्य या जागीरें राजाओं या जागीरदारोंकी वैधानिक मिलकियत है, वैध धन है, तब उन्हें उचित मूल्य बिना दिये और उन्हें बिना सन्तुष्ट किये मनमानी कुछ देकर अपहरण करना एक प्रकारका स्तेय ही है।

व्यक्तिगत सम्पत्ति और धर्मशास्त्र

आजकल कुछ लोग भूमिस्वामी कहनेमें हिचकिचाते हैं। परंतु वस्तुत: यदि कोई अपने सिरकी टोपीका स्वामी हो सकता है, अपनी झोपड़ी और पत्नीका पति हो सकता है, तो भूस्वामी होना भी कोई अनहोनी घटना नहीं। यदि दृढ़तासे अपनी टोपीकी रक्षा न की जायगी, तो गुंडे टोपी भी छीन लेंगे, अपनी थालीकी रोटीको भी उठा ले जायँगे, झोपड़ी और पत्नी भी छिन जायगी। इसलिये कुछ पुराने साम्यवादियोंका भी मत था कि मौजूदा राज्य-शासनसे अलग रहकर ही स्वतन्त्ररूपसे साम्यवादी पंचायती शासन कायम किये जाने चाहिये। नैतिक, आर्थिक भावनाओंके कारण किसीकी व्यक्तिगत सम्पत्तिमें हाथ डालना ये लोग अनुचित समझते थे।

— धर्मसम्राट् पूज्य स्वामीश्री करपात्रीजी महाराज द्वारा लिखित
पुस्तक “मार्क्सवाद और रामराज्य” अध्याय “व्यक्तिगत सम्पत्ति” पृष्ठ संख्या ३४०-३४१

वैयक्तिक सम्पत्ति और आर्थिक सन्तुलन


सम्पत्ति पर वैयक्तिक अधिकार रामराज्य में मान्य है, जबकि भौतिकवादी राजनीतियों का विकास इससे विपरीत है। पश्चिम के राजतन्त्र ने अपने ऊपर नियामक धर्म के विरुद्ध क्रान्ति को। इसी प्रकार पूँजीपतियों ने अपने ऊपर नियामक राज्यशाही के विरुद्ध क्रान्ति पर पार्लमेण्टरी सरकार की स्थापना की और ‘जनतन्त्र‘ का नारा लगाया। फलतः वैयक्तिक स्वार्थमूलक शोषण का प्रादुर्भाव हुआ, क्योंकि इन दो क्रान्तियों से व्यक्ति की उद्दाम प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण करने वाले धर्म तथा राज्य दोनों की समाप्ति हो गयी और प्रतियोगितामूलक, उपयोगितावादी जनतन्त्र का विकास हुआ। वहाँ के समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों तथा वैज्ञानिकों ने अवसर विशेष के कारण उस भ्रष्ट जनतन्त्र का समर्थन किया। ‘बेन्थम‘ जैसे उदार विचारवाले व्यक्ति ने अधिकतम लोगों के ही सुख की अभिकांक्षा की। प्रसिद्ध जीवशास्त्री ‘स्पेंसर‘ तथा ‘डार्विन‘ जैसे विद्वानों ने भी ‘संघर्ष में योग्यतम ही बच सकता है और उसे ही बचना चाहिए‘ इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।’माल्यस‘ ने इस भ्रष्ट जनतन्त्र से उत्पन्न अवस्था के असन्तुलन का उत्तरदायी जनसंख्या के सिद्धान्त से प्रकृति को बतलाया।

जनतन्त्रवाद के गर्भ में शोषण तथा उत्पीड़न का जन्म

निष्कर्ष यह कि धर्म तथा राज्यशक्तियों के नियन्त्रण से विहीन वैयक्तिक सम्पत्तिमूलक जनतन्त्रवाद के गर्भ में शोषण तथा उत्पीड़न का जन्म हुआ। एक ओर सन्तरे सड़ रहे थे, तो दूसरी ओर वे लोगों को इलाज के लिए भी नहीं मिलते थे। एक ओर कड़ाके के जाड़े में भी महलों के लोग गर्मी से पीड़ित थे तो दूसरी ओर लोग गर्मी के महीनों में भी भूख की ज्वाला से सड़कों पर ठण्डे हो रहे थे। तात्पर्य यह कि इस परिस्थिति में ऐसे अव्यवस्थित समाज का जन्म हुआ, जिसमें एक ओर लोग अतिसुख से दुःखी थे और दूसरी ओर मनुष्य जैसी अमूल्य ईश्वर की रचनामात्र ‘कंकाल की छाया‘ बनकर माँगपूर्ति का सन्तुलन-बिन्दु बनी थी।

प्रतिक्रियास्वरूप समाज ने वैयक्तिक सम्पत्ति के विरुद्ध नारा लगाया। सम्पत्ति का समाजीकरण, केन्द्रीकरण, राष्ट्रीकरण, केन्द्रीकरण आदि आर्थिक धारणाएँ समाज में उठने लगीं। समाजवादी, साम्यवादी, फासिस्टवादी और नाजीवादी आदि प्रवृत्तियाँ ऐसे ही विचारों का प्रतिनिधित्व करती थीं। ‘मार्क्स‘ ने वैयक्तिक सम्पत्ति समाप्त कर सर्वहारा के अधिनायकत्व का समर्थन किया और ‘लेनिन‘ ने उसका यूरोप के बड़े भूभाग रूस पर प्रयोग किया। उसका संघटनस्तालिन‘ ने किया, जिसमें अधिनायकत्व शासन ने वैयक्तिक सम्पत्ति नष्ट करने का प्रयत्न किया उसे कहाँ तक सफलता मिली, वहाँ की जनता ने किस प्रकार विवशतापूर्वक रक्त स्नान किया, यह स्वतन्त्र विषय है। वहाँ की नागरिक स्थिति उस कुत्ते से अच्छी नहीं, जिसे खाने-पीने, स्नान करने की तो पूर्ण व्यवस्था हो, किन्तु स्वतन्त्रतापूर्वक टहलने और भौकने पर पूर्ण प्रतिबन्ध है। साम्यवाद पूँजी के केन्द्रीकरण का प्रतिवाद प्रस्तुत करता है, किन्तु आज विश्व की आर्थिक व्यवस्थाओं में पूँजी का केन्द्रीकरण स्वयं रूस में सर्वाधिक है। जनता के नाम पर लेनिन, स्तालिन और खुश्चेव ने वैसे ही किया और कर रहे हैं, जैसे १४वीं शताब्दी में ‘लुई‘ ने भगवान् के नाम पर फ्रांस पर शासन किया था।

स्वतन्त्रता पर पूर्ण प्रतिबन्ध
कहा जाता है कि रूस में वर्ग, जाति, शोषण के स्रोत तथा पूँजीवादी मनोवृत्ति का पूर्ण ‘सफाया‘ हो गया है, फिर भी शासन में खर्च का सर्वाधिक और आन्तरिक खुफिया, पुलिस आदि पर खर्च किया जाता है। मालेनकोव, मोलोतोव बुल्गानिन, खुश्चेव जैसे मार्क्सवाद के यशस्वी नेता गद्दार बन जाते हैं। क्या मनुष्य पर विश्वास करनेवाले मार्क्स के काल्पनिक ‘राज्यविहीन समाज‘ की ओर रूस में जाने का यही मार्ग है ? कहने का तात्पर्य यह है कि वैयक्तिक सम्पत्ति के उन्मूलन का प्रयास तो किया गया है, किन्तु समाज में व्याप्त वैयक्तिक आकांक्षाओं के उन्मूलन के लिए सैन्य-शक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी मार्ग का अवलम्बन नहीं किया गया। जो कोई अन्य मार्ग था, उसे मार्क्स ने ‘अफीम की गोली‘ समझा।

भय और हिंसा का राज
वस्तुतः ‘अरस्तू‘ के शब्दों में वैयक्तिक सम्पत्ति वह दर्पण है, जिसमें मनुष्य अपना प्रतिबिम्ब देखता है। आगे चलकर उसने कहा है कि ‘मनुष्य का जो कुछ अपना है, उसी पर वह गर्व करता है।
वैयक्तिक सम्पत्ति
रामराज्य में वैयक्तिक सम्पत्ति तो मान्य है, किन्तु उसका सन्तुलन किया जाता है। वैयक्तिक सम्पत्ति की उत्पत्ति स्वत्व द्वारा होती है। स्वत्व सात प्रकार का हुआ करता है: १. दाय, २. निध्यादि और पुरस्कार का लाभ, ३. क्रय द्वारा अर्जन, ४. विजय, ५. सूद, ६.कर्मयोग (कृषि आदि) और ७. सत्प्रतिग्रह :

सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः।
प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च।।

(मनु०, १०.११५)

स्वत्व के सात प्रकार
हम देखते हैं कि चेतन से उत्पत्ति, नियन्त्रण तथा प्रभुत्व ये तीन बातें अचेतन पर होती हैं। लोक में भी अचेतन पर चेतन का ही स्वत्व होता है। अतएव उस परम चेतन का पुत्र ही इस अचेतन (प्रकृति) का उत्तराधिकारी हुआ। इसलिए ब्रह्मा, वशिष्ठ, दक्ष, मनु तथा इक्ष्वाकु में परम्परया उत्तराधिकार का विकास होता है। उससे भी आगे विजय, अर्जन, दान, पुरस्कार से स्वत्व का विकास हुआ। यहीं पर धर्म की भी बात आती है जिसने जैसा धर्माचरण किया, उसे वैसा ही सुख-साधन (स्वत्व) प्राप्त हुआ। चूँकि शुभाशुभ कर्मों में विभिन्नता है, अतएव समष्टि जगत् या व्यक्ति के असाधारण स्वत्व उत्पन्न होने में भी विभिन्नता होगी। जिनके शुभाशुभ कर्मों का सन्तुलन पेट भरकर जीनेमात्र तक है, उनको उतना ही स्वत्व प्राप्त होगा।

उत्तराधिकार के साथ उत्तराधिकारी को अपने पूर्वजों के उत्तरदायित्व को वहन करना पड़ता है। उसकी अवहेलना पर उर उसे उत्तराधिकार से भी वंचित रहना पड़ता है। मरने के समय पिता सम्प्रति कर्म करता है। उस समय अपने पुत्रों से कहता है : त्वं ब्रह्म, त्वं यज्ञः, त्वं लोकः। पुत्र उत्तर देता है : अहं ब्रह्म, अहं यज्ञः, अहं लोक: (बृह० ३०, १.५.१७)। अर्थात् पिता पुत्र से कहता है कि अनधीत वेदों का अध्ययन करना, अकृत यज्ञों को सम्पन्न करना, अपूर्ण लोकसम्पादन को पूर्ण करना, यह तुम्हारा कर्तव्य है और पुत्र उसे स्वीकार करता है। ध्यान देने की बात है कि यदि पुत्र पिता की आज्ञाओं का पालन नहीं करता तो वह असाधु है। असाधु से सम्पत्ति छीनी जा सकती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि दाय का आधार धर्म है।
उत्तराधिकार: सम्पत्ति नहीं कर्तव्य
धर्महीन होना पशु का लक्षण है और उत्तराधिकारहीन व्यवस्था भी पशुता का लक्षण है; क्योंकि उत्तराधिकार वैयक्तिक सम्पत्ति में ही सम्भव है। मनुष्य में ही यह पाया जाता है। पशु में न वैयक्तिक सम्पत्ति है, न उत्तराधिकारउत्तराधिकार के लिए अपने पिता का पुत्र बनना पड़ता है जिसमें प्रत्यक्ष तथा अनुमान के स्थान पर शब्द (आगम) प्रमाण की आवश्यकता पड़ती है। यही कारण है कि मनुष्य में शब्द-प्रमाण पाया जाता है। अतएव शब्दप्रमाण मानना मनुष्य का असाधारण लक्षण है। अनुमान तथा प्रत्यक्ष प्रमाण तो पशु भी मानता है। चूँकि मनुष्य आगम प्रमाण मानता है, इसलिए माता तथा भगिनी आदि का व्यवहार भी कर पाता है। किन्तु पशु में न आगम प्रमाण है, न माता-भगिनी का व्यवहार। इस प्रकार कह सकते हैं कि आगम प्रमाण के मिटने पर पशुता का विकास होगा। इसी प्रकार यह भी कह सकते हैं कि व्यक्तिगत सम्पत्ति होने पर ही हानि का डर और लाभ का लोभ है। फलतः सभ्यता के विकास की सम्भावना भी हो सकती है।
रामराज्य में आर्थिक सन्तुलन
वैयक्तिक सम्पत्ति के मानने पर विषमता का विकास होता है। पूँजीवादी देशों में इस असन्तुलन को सन्तुलित करने का प्रयास नहीं किया गया। फलतः उसकी सारी अच्छाइयाँ बुराइयों में परिणत हो गयीं। किन्तु रामराज्य में आर्थिक सन्तुलन स्थापित करने के लिए धर्म तथा राज्यशक्ति द्वारा प्रयास किया जाता है। जहाँ धर्म और राज्यशक्ति दोनों की अवहेलना होती है, उसे हम ‘अराजकतन्त्र‘ कहते है। सर्वप्रथम हम देखते हैं कि किस प्रकार से धर्म के आधार पर आर्थिक सन्तुलन स्थापित किया जाता है।

भोग के साथ दान, परोपकार, अतिथि सत्कार, यज्ञादि के द्वारा धार्मिकता तथा सन्तुलन दोनों का विकास होता है। सम्पूर्ण प्रकृति को ईश्वरमय समझकर तथा सम्पूर्ण जीवमात्र को इश्वरांश समझकर उससे बचे हुए अंश का हर्ष से स्वीकार करना ही रामराज्य की अर्थनीति का मूलमन्त्र है।

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किच जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुंजीथाः मा गृधः कस्य स्विद्वनम्।।

(ईशोप०, १.१)

प्रकृति ईश्वरमय है

हमारा यही आदर्श है। यही कारण है कि कोई शुद्ध भारतीय एक घूँट जल भी पीने लगता है तो उसे भगवान् के चरणों में अर्पित और प्रसाद समझकर पान करता है। यद्यपि समाज में व्यष्टि के शुभाशुभ कर्मों के अनुसार विषमता का निर्माण होता रहता है, फिर भी प्रत्येक आस्तिक जीवमात्र को बन्धु समझकर (अमृतस्य पुत्राः) सर्वथा समता की ओर अग्रसर होता रहता है। परोपकार एक व्यापक धर्म माना गया है।

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।

जब यह उदार भाव आता है, व्यष्टि अपने को समष्टि का प्रतिबिम्ब अर्थात् विराट के रूप में समझने लगता है। नेत्र सूर्य, उदर आकाश, कुक्षि समुद्र, अस्थि पर्वत, रोमावलियों वृक्ष इस प्रकार के भाव होने पर अपने पराये का प्रश्न ही विलीन हो जाता है। उस समय समष्टि दुःख में दुःखी तथा समष्टि-सुख में सुखी होना पड़ता है। आत्मवत् समस्त ब्रह्माण्ड में सुख-दुःख के भाव का विकास होने पर अपने दुःख और सुख का भाव ही नष्ट हो जाता है। इव अवस्था में शोषण और उत्पीड़न का प्रश्न ही कहाँ उठ सकता है ? यह भाव जहाँ तक विकसित होगा, उतने अंश में कल्याण अवश्य होगा।
मधुविद्या: समष्टि में व्यष्टि
उपनिषदों में ‘मधुविद्या‘ का उपदेश दिया गया है, जिसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे का सुख साधन बने। कुटुम्ब, ग्राम, प्रान्त, राष्ट्र, विश्व, पितृलोक, देवलोक आदि के प्रति क्रमशः व्यक्ति में समाज के कल्याणभावना का उदय होना आवश्यक है। एक साधक सोचता है कि हे भगवन् ! जगत् आपने खेलने के लिए खिलौना बनाया। कुछ दुर्बुद्धि उसमें ममता करते हैं। वस्तुतः आप ही रचयिता तथा सर्वस्व हैं। सम्पूर्ण वस्तु ईश्वरीय है। इस प्रकार सम्पत्ति का राष्ट्रीकरण, केन्द्रीकरण तथा समाजीकरण न होकर उसका ‘ईश्वरीकरण‘ होता है। उससे निरन्तर चिन्ता लगी रहती है कि वस्तु समष्टि-कल्याण में ही उपयुक्त हो। इस कर्तव्य पालन में उसे शरीर तक का मोह नहीं रहता।
राष्ट्रीयकरण बनाम ईश्वरीकरण
यहाँ एक बात और ध्यान देने की है। जहाँ एक तरफ त्याग, दान, परोपकार, आतिथ्य, सेवा आदि द्वारा समष्टि सेवा का भाव बढ़ाने का प्रयत्न किया गया, वहीं दूसरी तरफ व्यष्टि को प्रतिग्रह से बचने के लिए भी उपदेश दिया गया; क्योंकि धर्माधारित समाजव्यवस्था में निष्क्रियता आकाशकुसुमवत् है। उसमें पुरुषार्थ को प्रोत्साहित किया जाता है। उञ्छ तथा शिल वृत्ति को श्रेष्ठ बतलाया गया है। कुसूलधान्यज्ञ और कुम्भीधान्यक, त्र्यहिक, अश्वस्तनिक को उत्तरोत्तर श्रेष्ठ बताया गया है। कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः यह एक साधारण सी कहावत थी। स्थिति यह होती है कि देनेवालों में त्याग और लेनेवालों में लेने से सर्वथा दूर रहने का प्रयत्न होता था। इस धर्म के प्रभाव से आर्थिक सन्तुलन बना रहता था। आध्यात्मिक तथा भौतिक अर्थनीति में यही अन्तर है कि एक में देनेवालों में देने की होड़ लगती थी, किन्तु कोई लेनेवाला नहीं। दूसरे में देनेवाले देने से जान बचाते हैं, किन्तु लेनेवाले नारा लगाते है ‘लड़कर लेंगे, मरकर लेंगे‘ और मारकर लेंगे।’ ऐसे शब्द भी धर्मशासित राष्ट्र में सुनायी नहीं पड़ते।
हिन्दूराष्ट्र में आर्थिक सन्तुलन और न्याय
यह तो हुई धर्माधारित समाज की व्यवस्थाव्यष्टि इन सिद्धान्तों को मानने में असमर्थता दिखाता है, तो राज्यशक्ति द्वारा इन सिद्धान्तों के पालन के लिए बाध्य किया जाता है। राज्य इस बात की चेष्टा करता है कि प्रत्येक व्यक्ति निर्धारित सामान्य जीवनस्तर के सुखसाधन प्राप्त कर सकें। इसके अतिरिक्त न तो वह मोटे को छील सकता है, न पतले को मोटा बना सकता है। समाजवादी तभी समानता से विकास के अवसर की ही समानता की बात स्वीकार करते हैं। बात भी ऐसी ही है, क्योंकि अतिविषमता मिटायी जा सकती है, लेकिन पूर्ण समानता कभी स्थापित नहीं की जा सकती।

विषमता के अतिरेक का प्रश्न अतिरेक (सरप्लस) से आरम्भ होता है। पूँजीवादी राष्ट्रों में लाभ अर्थात् अतिरेक का बँटवारा नहीं होता। रामराज्य में वैयक्तिक सम्पत्ति के होते हुए भी अतिरिक्त का बँटवारा मान्य है और वह भी पाँच भागों में :

धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च।
पञ्चाघा विभजन् वित्तमिहामुत्र च मोदते।।

(भाग०, ८.१९.२७)
धन का ५ भागों में विनियोग
धर्म, यश, मूलसम्पत्ति की रक्षा, स्वजीवनयापन के लिए, उद्योग में लगे स्वजनों के लिए – ये पाँच भाग है। यह विश्व की अर्थनीति के लिए धर्माधिष्ठित रामराज्य की अर्थनीति को अपूर्व देते हैं।

पाँच विभागों में बँटवारा करते समय एक अंश धनाध्यक्ष के पास स्वतन्त्र हो जाता है, अतएव अनावश्यक विषमता का बीजारोपण होता है। उसके लिए व्यवस्था यह है कि प्रत्येक ऐसा व्यक्ति जिसके पास ३ वर्ष के लिए पर्याप्त सामग्री हो जाय, ज्योतिष्टोम यज्ञ करे :

यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये।
अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति।।

(मनु०, ११.७)
संचय की सीमा - ३ वर्ष
यह नित्यकर्म माना है, अर्थात् अनिवार्य। इस प्रकार पुनः सम्पत्ति का वितरण होकर व्यक्ति राष्ट्र के सामान्य जीवनस्तर पर पहुँच जाता है। इतने पर भी यदि व्यक्ति अतिविषमता की ओर उन्मुख हुआ और उसके पास सम्पत्ति इकट्ठी होने लगी, तो उसका अर्थ यही समझा जायगा कि उसने समाज के साथ चोरी की है। अतएव वह चोर है, उसे चोर की तरह दण्ड देकर पेटभर अन्न के मार्ग पर पुनः ला दिया जाय :

यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति।।

(भाग०, ७.१४.८)

चोर कौन है?

जैसा कि बतलाया है, उत्तराधिकार के नियम में यह बात है कि उत्तराधिकारी समष्टि-कल्याणमूलक परम्पराओं का अवश्य पालन करे। अन्यथा उसे उत्तराधिकार से भी वंचित कर दिया जा सकता है, क्योंकि उस स्थिति में व्यक्ति असाधु माना जाता है और उससे राज्य द्वारा सम्पत्ति छीनी जा सकती है। लेकिन राज्य के लिए यह आवश्यक है कि वह उस सम्पत्ति को अपने हाथ में लेकर साधु व्यक्ति के हाथ में दे दे। मनु ने कहा है :

योऽसाधुम्योऽर्थमादाय साधुभ्यः सम्प्रयच्छति।
स कृत्वा प्लवमात्मानं सन्तारयति तावुभौ।।

(मनु०, ११.१९)

राज्य की भूमिका: दण्ड और न्याय
राज्य आर्थिक सन्तुलन को सदा चेष्टा किया करता है। जो व्यक्ति निर्धन हो गया है, उद्योग में जिसे सफलता नहीं मिली, फिर भी योग्य हो तो राज्य का कर्तव्य होता है कि उसे बिना ब्याज का धन दिलाये। इस प्रकार वह सहायता देकर, दिलाकर व्यक्ति का उत्थान करता है। हाँ, वह इस बात की चेष्टा करता रहता है कि ‘सहायता देनेवाला कहीं स्वयं सहायता पाने की हालत में आ जाय।’ अर्थात् एक वर्ग के व्यक्ति की उन्नति का तात्पर्य सम्पूर्ण समाज की उन्नति है।’ यह भाव रामराज्य में ही सम्भव है। शस्त्र और शास्त्र दोनों के उचित प्रयोग से राज्य शक्ति और वैयक्तिक सम्पत्ति में ऐसा सम्बन्ध बनता है कि आर्थिक सन्तुलन बना रहे।
वास्तविक आर्थिक स्वराज्य
— धर्मसम्राट् पूज्य स्वामीश्री करपात्रीजी महाराज द्वारा लिखित
पुस्तक “विचार पीयूष” अध्याय “वैयक्तिक सम्पत्ति और आर्थिक सन्तुलन” पृष्ठ संख्या ५४२-५४८
The Third Way: Achieving Economic Balance
The Third Way: Achieving Economic Balance

आर्थिक असन्तुलन


आर्थिक असंतुलन मिटानेके लिये ही शास्त्रोंमें दानका महत्त्व कहा गया है। अपनी श्रद्धासे, दूसरोंके उपदेशसे, लज्जासे, भयसे किसी तरह भी देना परम कल्याणकारी है। शास्त्रोंमें यह भी कहा गया है कि जो धनी होकर दानी नहीं और निर्धन होकर तपस्वी नहीं, ऐसे लोग गलेमें पत्थर बाँधकर समुद्रमें डुबा देने योग्य होते हैं—

द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम्।
धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम्॥

(महा० उद्योग०, ३३.६०)

रामराज्यकी अर्थनीति

रामराज्यकी अर्थनीतिमें उपार्जन और उपयोग दोनों ही धर्मनियन्त्रित होते हैं। पर्वत खनन जैसे अति क्लेशसे होनेवाले स्वल्प लाभको तथा धर्मातिक्रमणजन्य लाभको एवं शत्रुचरणचुम्बनसे होनेवाले लाभको हेय समझना ही उचित है—

अतिक्लेशेन येऽर्था: स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण वा।
अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म तेषु मन: कृथा:॥

(महा० उद्योग०, ३९.७५)

ईमानदारीकी कमाईसे सुख-शान्ति

दूसरोंकी बिना संताप पहुँचाये, सद्धर्मका अतिक्रमण बिना किये, खलोंके द्वारोंपर बिना घुटना टेके मिलनेवाले स्वल्प लाभको भी बहुत समझना चाहिये।

अकृत्वा परसन्तापमगत्वा खलमन्दिरम्। अनुल्लङ्घॺ सतां वर्त्म यत्स्वल्पमपि तद्बहु॥
(शार्ङ्ग० पद्ध० स० )

ईमानदारीकी कमाईसे सुख-शान्ति एवं समृद्धि होती है। प्रसिद्ध है कि ईमानदारीका धन पानीमें नहीं डूबता, आगमें नहीं जलता और चोरके पेटमें नहीं हजम होता। उसीसे बरक्कत भी होती है। वंश-वृद्धि भी उसीसे होती है। बेईमानीसे भले ही तत्काल बड़ा लाभ हो, पर वह टिकाऊ नहीं होता। उलटे सुख-समृद्धि लेकर चला जाता है। वंशवृद्धिके अनुकूल भी नहीं होता।

अतिरिक्त आय का पंचधा विभाग

न्यायार्जित धनमें भी टैक्स आदिका खर्च निकालकर अतिरिक्त आयमें पंचधा विभाग करके ही यथोचित उपयोग करना ठीक होता है। प्रथम विभाग धर्मार्थ राष्ट्रके हितमें व्यय किया जाय, द्वितीय भाग यशके लिये राष्ट्रमें व्यय किया जाय; तृतीय भाग अर्थार्जन या मूल सम्पत्ति-रक्षणके काममें लाया जाय और चतुर्थ भाग अपने काममें लगाया जाय। पाँचवाँ भाग कुटुम्बी, नौकर, मजदूर आदि स्वजनोंके काममें लगाया जाय। पाँच हिस्सामें एक हिस्सा अपने काममें लगानेकी अनुमति है, परंतु उसमें भी नियन्त्रण है कि जितनेमें पेट भरे, तन ढके, उतनेमें ही ममत्व उचित है। अधिकमें ममत्व करना चौर्य है, उसे दण्ड मिलना चाहिये। इस तरह पाँच हिस्सेमें चार हिस्सा राष्ट्रहितके काममें आता ही है। एक हिस्सेमें भी यथावश्यक अपने उपयोगमें लगाना उचित है।
व्यक्ति शासनयन्त्रका नगण्य कल-पुर्जा
तथाकथित राष्ट्रीकरणमें राष्ट्रकी भूमि, सम्पत्ति, कल-कारखानों, उद्योग-धन्धोंका सरकारीकरण हो जाता है। व्यक्ति शासनयन्त्रका नगण्य कल-पुर्जा बन जाता है। शासनयन्त्र किसी दल या दलके तानाशाहोंके हाथका कठपुतला बन जाता है। ऐसी तथाकथित सरकारें बिना नकेलके ऊँट, बिना लगामके घोड़े, बिना ब्रेकके मोटर अथवा बिना ड्राइवरके स्टार्ट की हुई मोटरके समान खतरनाक हो जाती हैं। सब वस्तुओंका राष्ट्रीकरण शास्त्र और धर्मसे विरुद्ध तो है ही, लौकिक दृष्टिसे भी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता नष्ट हो जानेसे व्यक्तिगत विकास रुक जाता है।

व्यक्तियोंका समुदाय ही कुटुम्ब, नगर, राष्ट्र तथा विश्व होता है। जैसे एक-एक वृक्षोंके कट जानेपर वन कट जाता है, एक-एक सैनिकोंके नष्ट हो जानेपर सेना नष्ट हो जाती है, वैसे ही एक-एक व्यक्तियोंके परतन्त्र, अशिक्षित, निर्धन, निर्बल हो जानेपर राष्ट्र एवम् विश्व भी वैसा ही हो जाता है। एक-एक व्यक्तियोंके हृष्ट-पुष्ट, बलवान् तथा बुद्धिमान् होनेपर राष्ट्र तथा विश्व भी हृष्ट-पुष्ट, बलवान् तथा बुद्धिमान् हो जाता है। व्यक्तिगत सम्पत्ति-शक्ति नष्ट हो जानेपर शासन निरंकुश हो जाता है, उसे हरा सकनेकी शक्ति जनताके पास नहीं रहती। नोटिस, पोस्टर, अखबार, सभा, आन्दोलन आदि सभी कामोंमें द्रव्यकी अपेक्षा होती है। सब चीज सरकारके हाथमें रहनेसे व्यक्ति एवं तत्समुदाय जनता कुछ न कर सकेगी। अत: जनतामें शक्ति भी रहना आवश्यक है।
सशक्त व्यक्ति सशक्त राष्ट्र
वस्तुत: अतिसमता और अतिविषमता दोनों ही दोष प्रतीत होते हैं। हाथकी अंगुलियाँ भी यदि अति विषम हों तो भी, अति सम हों तो भी, बेढंगी लगेंगी। पेट, पैर, हाथ सम हों तो भी ठीक नहीं और यदि पेट बहुत मोटा, पैर-हाथ बहुत पतले हों तो भी रोग ही समझा जायगा। इस तरह आवश्यक है कि योग्यता-आवश्यकताके अनुसार सभीके काम, दाम, आरामकी व्यवस्था हो। भले ही चींटीको कनभर, हाथीको मनभरके अनुसार योग्यता और आवश्यकताका ध्यान रखा जाय, परंतु आरामकी कमी नहीं होनी चाहिये। केन्द्रीकरण या राष्ट्रीकरणकी अपेक्षा विकेन्द्रीकरण सदा ही सर्वश्रेष्ठ है। इसमें एक तो सम्पत्ति सम्बन्धी परम्परागत ईश्वरीय नियमका रक्षण होता है, ‘सप्तवित्तागमा धर्म्या:’ के अनुसार दाय, जय, क्रय, पुरस्कारादिमें प्राप्त सम्पत्ति वैध मानी जायगी, पितृ, पितामहकी सम्पत्तिमें पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रका जन्मना स्वत्व स्वीकृत होगा तथा जय, क्रयादिद्वारा भी व्यक्तिगत विकासका अवकाश रहेगा।

अतिरिक्त आयका पंचधा विभागद्वारा धार्मिक दृष्टिसे कर्तव्य-बुद्धिसे राष्ट्रके हितार्थ अधिकांश आयका व्यय होगा। मूल सम्पत्तिका भी अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, संग्राम आदि असाधारण परिस्थितिमें, जैसे सरकारी खजानेकी सम्पत्तिका राष्ट्रहितार्थ विनियोग होता है, वैसे ही व्यक्तिगत मूल सुरक्षित धन भी काममें आ सकेगा। इस तरह धर्मनियन्त्रित नीतिमें आर्थिक असंतुलन भी नहीं होता। व्यक्तिगत विकासका अवकाश बना रहता है। पितृ-पितामहादि-परम्पराप्राप्त दायाधिकार भी बना रहता है। दाम, आरामकी विशेषताके लिये ही काममें विशेषता-सम्पादनकी प्रवृत्ति होती है। तभी विविध प्रतियोगिताएँ भी सार्थक होती हैं। लौकिक कहावत है कि ‘हानिका डर एवं लाभका लोभ ही प्राणीको प्रगतिशील बनाता है।’ भय और लोभके बिना आमतौरपर प्राणी निरुत्साह रहता है।
हानिका डर एवं लाभका लोभ
सब वस्तुओंके राष्ट्रियकरणसे मनुष्य भी यन्त्रवत् काम करता है, ममत्व न होनेसे तत्परता और सावधानीसे काम नहीं होता। जिस नौकरशाहीकी पहले निन्दा की जाती थी, वही नौकरशाही सिरपर आ जाती है। यही कारण है कि नौकरोंकी देख-रेख रखते हुए भी गोदामोंमें लाखों टन अन्न सड़ जाते हैं। उपार्जन करनेवालोंको जितनी ममता अपनी छोटी अन्नराशिमें होती है और जितनी तत्परतासे वह उसकी रक्षा करता है, सरकारी नौकरोंमें उतनी ममता ही होती है और तो रक्षणका ही ध्यान रहता है। यही स्थिति बड़े-बड़े कामोंकी है। कागजी घोड़े दौड़ानेमें करोड़ों खर्च हो जाते हैं, काम कुछ नहीं हो पाता। दामोदरघाटी, हीराकुण्ड आदिके कामोंमें कितना व्यय और कितनी असफलता हुई, यह स्पष्ट ही है। पंजाबके बाँध और विद्युत्केन्द्र-निर्माणमें भी यही हालत है।
आर्थिक संतुलन का धर्म-मार्ग
अस्तु! अभिप्राय यह है कि जब विकेन्द्रीकरणके पक्षमें अनेक अच्छाइयाँ हैं तो आस्तिकोंको उसे व्यवहारमें लानेका प्रयत्न करना चाहिये। सबसे पहले तो प्रत्येक नागरिक यह नियम बनाये कि उसके ग्राम, नगर, पड़ोसमें कोई व्यक्ति भूखा, नंगा नहीं रहने पायेगा। बिना भूखेको खिलाये न खायँगे। रोगीका इलाज-प्रबन्ध बिना किये विश्राम न करेंगे। विशेषत: शासक तो कुटुम्बपतिके तुल्य होता है। जैसे कुटुम्बके भोजन, वस्त्रका प्रबन्ध कर लेनेके बाद ही कुटुम्बपति भोजन, वस्त्र ग्रहण करता है, उसी तरह राष्ट्रके भोजन, वस्त्रादिका प्रबन्ध करा लेनेके बाद ही शासकोंको भोजन, वस्त्रादि ग्रहण करना चाहिये।
नीलकण्ठ भगवान् शिव
इतना ही क्यों, भगवान् शिवके समान कुटुम्बपति अमृत कुटुम्बके अन्य सदस्योंको बाँट देता है और स्वयं विषको ही ग्रहण कर लेता है। कौस्तुभ, लक्ष्मी, ऐरावत, उच्चै:श्रवा, अमृत आदि अन्य सभी रत्न देवताओंके हिस्सेमें पड़े, विष शंकरके हिस्सेमें। विषको भी शिवजीने पेटमें रखकर तो पेटको ही विषैला बनाया और न मुखमें रखकर मुखको ही जहरीला बनाया; बल्कि उसे कण्ठमें ही रख लिया। ठीक ऐसे ही कुटुम्ब या राष्ट्रके मालिक पुरुखाको कठिनाइयोंको विषके घूँटके तुल्य स्वयं सहना पड़ता है। वह उसकी कटुतासे न पेटको, न मुखको ही कड़वा बनने देता है। पेटका विषैलापन या मुखका विषैलापन दोनों ही संघटनको छिन्न-भिन्न कर देते हैं, परंतु जब कोई अच्छी वस्तु, अच्छे वस्त्र, भूषण, भोजनादि मिलें तो घरका कोई मालिक अपने बच्चोंकी और अपनी परवा न कर कुटुम्बके अन्य सदस्योंको ही बाँट देता है। तभी उसके नियन्त्रणमें कुटुम्बका संचालन ठीक चलता है।

— धर्मसम्राट् पूज्य स्वामीश्री करपात्रीजी महाराज द्वारा लिखित
पुस्तक “मार्क्सवाद और रामराज्य” अध्याय “आर्थिक असन्तुलन” पृष्ठ संख्या ३५७-३६१
हिन्दूराष्ट्र में आर्थिक सन्तुलन - एक वैकल्पिक दृष्टि
हिन्दूराष्ट्र में आर्थिक सन्तुलन – एक वैकल्पिक दृष्टि

मित्रैः सह साझां कुर्वन्तु