अन्त्यजों द्वारा ब्राह्मणोंका साथ छोड़ना

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श्री हरि:
श्रीगणेशाय नमः

नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते

जय गणेश
श्रियं सरस्वतीं गौरीं गणेशं स्कन्दमीश्वरम्।
ब्रह्माणं वह्निमिन्द्रादीन् वासुदेवं नमाम्यहम्॥

"लक्ष्मी, सरस्वती, गौरी, गणेश, कार्तिकेय,
शिव, ब्रह्मा एवम् इन्द्रादि देवोंको तथा
वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ।।"


हिन्दू समाजमें विघटन और समन्वय

अन्त्यजों द्वारा ब्राह्मणोंका साथ छोड़ना


ब्राह्मण स्वयंको अवैदिक कहनेवाले जैन तथा बौद्धोंके शासन और वर्चस्वके समय भी अनुजकल्प अन्त्यजोंने ब्राह्मणादिका साथ नहीं छोड़ा। तद्वत् विधर्मियोंके शासनकालमें भी उन्होंने ब्राह्मणादिका साथ नहीं छोड़ा। परन्तु अंग्रेजोंकी दुरभिसन्धिके वशीभूत स्वयंको वैदिक तथा सुधारक महात्मा माननेवाले गिने – चुने दिशाहीन हिन्दुओंके चपेटमें पड़कर अन्त्यजोंने ब्राह्मणादिका साथ छोड़ दिया
अन्त्यजोंका साथ छूटना: एक ऐतिहासिक भूल
अहिंसादिकी दिशाहीन परिभाषाने सज्जनताके नामपर अन्यायसहिष्णुता, कायरता तथा शूरता और ओजस्विताके नामपर आतंकप्रिय उग्रवादको प्रश्रय दिया है; जो कि सनातनसंस्कृतिके सर्वथा विरूप है। सनातनसंस्कृतिमें सुशीलता, शूरता और सत्पुरुषोंकी अनुगमनशीलताके कारण ओजस्विता तथा अमोघदर्शितासे सम्पन्नता सज्जनता है। —

रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी।।
(रामचरितमानस १.१७.९.)

स्वतन्त्र भारतमें जैन, बौद्ध, सिक्ख, अन्त्यज अपने उद्गमस्रोतसे वियुक्त होकर अपने अस्तित्व तथा आदर्शको विलुप्त कर रहे हैं और ब्राह्मणादि इनसे विहीन होकर अँगहीन क्षीण हो रहे हैं। इस विसंगतिको विलुप्त करनेकी भावनासे परस्पर सद्भावपूर्ण सम्वादके द्वारा भ्रम तथा भूलका निवारण अपेक्षित है।
समन्वयका मार्ग
— श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर-श्रीमज्जगद्गुरु-शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती द्वारा लिखित पुस्तक “नीतिनिधि” पृष्ठ संख्या २४५-२४६

मित्रैः सह साझां कुर्वन्तु

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