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श्री हरि:
श्रीगणेशाय नमः

नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते

जय गणेश
श्रियं सरस्वतीं गौरीं गणेशं स्कन्दमीश्वरम्।
ब्रह्माणं वह्निमिन्द्रादीन् वासुदेवं नमाम्यहम्॥

"लक्ष्मी, सरस्वती, गौरी, गणेश, कार्तिकेय,
शिव, ब्रह्मा एवम् इन्द्रादि देवोंको तथा
वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ।।"


This website provides the divine blueprint for a Hindu Rashtra – its basis, its structure, its Constitution (Samvidhan); and what should be done to make India a Hindu Rashtra. We envision Hindu Rashtra as a federation of traditional Indian City States (Princely States or Riyasats) organised under the Central Indian Government (Monarchical Kingdom). National Defence and Foreign Affairs will come under the domain of Central Monarchical Kingdom, while individual kingdoms can decide other matters as per their suitability. This outline of the HinduRashtra is divine because it is quoted from the works of Srimajjagadguru Shankaracharya Swami Shri Nishchalanand Saraswati Ji and his revered Gurudev Sarvabhuthriday Dharmasamrat Shri Hariharanand Saraswati ‘Karpatri’ Ji Maharaj.

We further explore the traditional rights & duties of a Hindu Kshatriya King towards his Praja (subjects), as he strives to ensure security, order, growth and harmony within the nation. It details the ideal qualities of the King of India (Chakravarti Samrat), and of the kings of various nation states within India. The website attempts to outline the ideal structure of Ministries and Armed Forces. We also discuss the economic, defence, agriculture, education and foreign policies that should be pursued by Hindu Rashtra.

There are severe shortcomings in the currently established model – democracy, which is based on individualism. It doesn’t align with the idea of a Hindu Rashtra which it is rooted in Hindu Varnashrama Vyavastha. India can become a Hindu Rashtra only if we adopt a monarchical (Rajtantra) model of governance based on Kshatra Dharma.

इस वेबसाइटके बारेमें


यह वेबसाइट हिन्दूराष्ट्रकी दैवीय रूपरेखा प्रदान करती है – इसका आधार, इसकी संरचना, इसका संविधान; और भारतको हिन्दूराष्ट्र बनानेके लिए क्या किया जाना चाहिए। हम हिन्दूराष्ट्रकी कल्पना पारंपरिक भारतीय रियासतोंके संघके रूपमें करते हैं जो केंद्रीय भारतीय सरकार (राजशाही साम्राज्य) के अधीन संगठित हों। राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश मामले केंद्रीय राजशाही साम्राज्यके अधिकार क्षेत्रमें आएंगे, जबकि अन्य मामलों पर अलग-अलग राज्य अपनी सुविधानुसार निर्णय ले सकेंगे। हिन्दूराष्ट्रकी यह रूपरेखा दैवीय इसलिए है, क्योंकि ये श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी और उनके पूज्य गुरुदेव सर्वभूतहृदय धर्मसम्राट् श्रीहरिहरानन्दसरस्वती ‘करपात्री’ जी महाराज के श्रीमुख और कलमसे उद्धृत है।

यहाँ एक हिन्दू क्षत्रिय राजाके अपनी प्रजाके प्रति पारम्परिक अधिकारों और कर्तव्योंको उद्भासित किया गया है, ताकि वह राष्ट्रके भीतर व्यवस्था, विकास, सुरक्षा और सद्भाव सुनिश्चित कर सके। यह भारतके सार्वभौम राजा और भारतके भीतर विभिन्न रियासतोंके राजाओंके आदर्श गुणोंका विवरण देता है। यह वेबसाइट आर्थिक, रक्षा, कृषि, शिक्षा और विदेश नीतियोंकी आदर्श संरचनाको रेखांकित करनेका प्रयास करती है। हिन्दूराष्ट्रमें किस प्रकारसे मंत्रालयों और सेनाकी संरचना जानी चाहिए, इस पर भी प्रकाश डालनेका प्रयास किया गया है।

क्षात्रधर्म (राजधर्म) की जड़ें वैदिक वर्णाश्रमव्यवस्थामें हैं, और ये वर्तमानमें स्थापित तंत्र – लोकतन्त्र(प्रजातन्त्र)से मेल नहीं खाती क्योंकि लोकतन्त्र व्यक्तिवाद पर आधारित है, और क्षात्रधर्म वर्णव्यवस्था (उचित जातिवाद) पर आधारित है। भारत हिन्दूराष्ट्र तभी बन सकता है जब क्षात्रधर्म पर आधारित शासनका मॉडल (अर्थात् राजतन्त्र) अपनाया जाएँ।
Map of Princely States of India (Pre Independence, 1942)
भारत की रियासतों का नक़्शा (स्वतंत्रतासे पूर्व, 1942)

यह प्रकल्प – hindurashtra.info वेबसाइट


यह प्रकल्प भारतको हिन्दूराष्ट्र बनानेके उद्धेश्यसे किया जा रहा है। हिन्दूराष्ट्रकी यह रूपरेखा वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत आदि शास्त्रोंसे, और उचित धार्मिक पुस्तकोंसे अलग अलग संदर्भमें ली गई है। क्षत्रियों (राजपूतों और अन्य क्षत्रियों) के पिछले एक हज़ार वर्षोंके शौर्य, पराक्रम और संगठनात्मक कौशलके भी संदर्भ हैं। कुछ भी लिखनेसे पहले राष्ट्रसमर्पित संतों, उचित ब्राह्मणों या ट्विटर(एक्स) पर उपस्थित पारम्परिक सोचके विद्वानोंसे मार्गदर्शन प्राप्त किया गया है। उसके बाद भी कुछ त्रुटियाँ हो सकती हैं, जिसके लिए क्षमाप्रार्थी हैं।

इस वेबसाइटमें कई स्थानों पर वेदों, पुराणों, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, महाभारत और राष्ट्रसमर्पित संतोंकी पुस्तकोंसे छंद और व्याख्यान लिए गए हैं। शास्त्रोंके अनुसार केवल ब्राह्मणोंको ही शास्त्रादि की शिक्षा देनेका अधिकार प्राप्त है। इस विषय पर जगद्गुरु पुरी शंकराचार्य महाभागने एक प्रश्नके उत्तरमें कहा था कि जो ब्राह्मण नहीं हैं, वे यदि शास्त्रोंके ज्ञानका प्रचार – प्रसार करें तो कभी भी व्यासगद्दीपर बैठनेकी मंशा या अभिलाषासे ना करें। भारत को हिन्दूराष्ट्र बनानेसे अधिक कोई इच्छा या लक्ष्य है ही नहीं। राष्ट्रकी वेदना है और शंकराचार्यके सैनिक हैं।

हम हिन्दूराष्ट्र बनाएँगे, हम भारत भव्य बनाएँगे।


इंदुसर से मानसर तक भारत बृहद बनाएँगे, भारत दिव्य बनाएँगे।।


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तत्त्व पक्षपातो हि स्वभावो धियम्


पूज्य गुरुदेव
मुण्डक आदि उपनिषदोंमें लिखा गया गया — शंकराचार्यने तत्त्वबोध नामक ग्रन्थमें लिखा — क्या लिखा जी ? अगर कोई एक ब्रह्मनिष्ठ हो जाता है तो उसके कुलमें नाद परम्परा या बिन्दु परम्पराकी दृष्टिसे कोई ब्रह्मवित् न हो ऐसा नहीं हो सकतापरम्परा चलती है, तो पूज्य गुरुदेवका संकल्प तो सच्चिदानन्दस्वरूप सर्वेश्वरका संकल्प था — वो तिरोहित दिखाई पड़ सकता है, विलुप्त तो हो ही नहीं सकता; उनका सिद्ध संकल्प तो भारतको अखण्ड करेगा, सकल सनातन मानबिन्दुओंकी रक्षा करेगा। अन्तमें वैचारिक धरातलपर हमारे पास एक सबसे बड़ा अस्त्र अभी बचा हुआ है। इस रॉकेट, कम्पुटर, एटम, मोबाइलके युगमें भी न केवल दार्शनिक अपितु वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातलपर भी भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, उत्सव, त्योहार, रक्षा, सेवा, न्याय, विवाह आदि सनातनधर्मियोंके जितने प्रकल्प हैं, उनके सामने विश्व घुटना टेकनेके लिए तैयार है।
सत्य
जीव सदा सत्यका पक्षधर होता है

पूज्य गुरुदेवने हमको पढ़ाते समय एक आत्मबम पकड़ाया, वैचारिक बम पकड़ाया — पञ्चदशीमें उसका नाम है श्रुति, युक्ति, अनुभूतिपूज्य गुरुदेवने कहा भविष्यमें नास्तिकताका ताण्डव नृत्य होगा। मेरी बातको गाँठ बाँध लोजो भी लिखो, जो भी बोलो और जो भी करोश्रुति, युक्ति, अनुभूतिमें सामञ्जस्य साधकर। इसीको आजकलकी प्रसिद्ध भाषामें मैं कहता हूँ — दर्शन, विज्ञान, व्यवहार तीनोंमें सामञ्जस्य साधकर बोलिए, लिखिए — पूरा विश्व नतमस्तक होगा। कोई भी तो प्रतिद्वंदी होकर खड़ा नहीं होगा और सनातन वैदिक सिद्धान्तको बौद्धोंने अपने शब्दोंमें गुम्फित किया — तत्त्व पक्षपातो हि स्वभावो धियम्। तत्त्व पक्षपातो हि स्वभावो धियम्। बुद्धि हो या बुद्धिका प्रयोक्ता जीव हो — सत्यका हमेशा पक्षधर होता है। बुद्धि सत्यकी हमेशा पक्षधर होती है, जीव अधमसे अधम क्यों न हो वो स्वयं सत्यका ही पक्षधर होता है।
तत्त्व पक्षपातो हि स्वभावो धियम्
उत्कृष्ट कला
कोई कम्युनिस्ट है, कोई क्रिस्चियन है, कोई मुस्लिम है, कोई पारसी है — तरह तरहके लोग हैं। लेकिन अगर इस रॉकेट, कम्पुटर, एटम, मोबाइलके युगमें भी दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातलपर सामञ्जस्य साधकर लोभ, भय, कोरी भावुकता और अविवेकके वशीभूत न होकर बोला जाए तो पूरा विश्व हमारा अनुगमन करनेके लिए तैयार है। हमारे पूर्वजोंने विशेषकर ब्राह्मणोंने विश्वको अर्थशास्त्र दिया, कामशास्त्र दिया, धर्मशास्त्र दिया, मोक्षशास्त्र दिया, चिकित्साशास्त्र दिया, गणित विज्ञान दिया, वस्त्र विज्ञान दिया – शुक्रनीतिके अनुसार कौन ऐसी बत्तीस विद्या, चौसठ कला जिसमे समग्र विद्या और कलाका अन्तर्भाव होता है, जो वैदिक महर्षियोंने विश्वको न दिया हो।
— श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती महाराजका वक्तव्य;

मित्रैः सह साझां कुर्वन्तु